संसार का उद्धारक

स्वामी विवेकानंद

गतांक से आगे…

यह तो हम नहीं कह सकते, लेकिन हम बाद में देखेंगे कि श्री रामकृष्ण के साथ नरेंद्र का यह मिलन मानो समुद्र के साथ नदी का, स्वर्ग के साथ मृत्यु लोक का एवं विश्व के साथ भारत का मिलन था। सुरेंद्रनाथ ने श्री रामकृष्ण के साथ-साथ उनके भक्तों को भी सादर आमंत्रित कर एक छोटे से उत्सव का आयोजन किया। भजन गाने के लिए अच्छे गायक की आवश्यकता थी। तब सुरेंद्र ने नरेंद्र को बुलवा लिया। नरेंद्र को देखते ही  श्रीरामकृष्ण देव चौंक उठे। अरे यह तो सप्तर्षि मंडल का महर्षि है। अपने अतींद्रिय दर्शन के बल से वो इस अनजान मनुष्य का परिचय जान गए। नरेंद्र एशोअराम से पले थे, रंग-रूप, पढ़ाई, लिखाई गाने-बजाने में अन्य लोगों से आगे रहते थे, लेकिन दीन दुखियों के लिए उनकी आत्मा रोती थी। वे सोचते इस विश्व संसार का कोई उद्धारक है भी या नहीं? अगर है तो कौन है? क्या उसे देखा जा सकता है? दयामय ईश्वर के राज्य में इतना दुख, इतनी विफलता, इतना अन्याय क्यों? इन प्रश्नों के उत्तर तलाशने पर भी उन्हें नहीं मिलता था। संसार में इतनी विषमता, धनी और निर्धन के बीच खाई किसने बनाई? जब सभी एक ही ईश्वर की संतान है, तब ब्राह्मण और चांडाल के बीच इस दंर्लंघनीय अंतराल का सृजन कैसे हुआ। इस प्रकार के सैकड़ों विचार उनके करुण हृदय को मथते रहे, लेकिन उनका जीवन शिशर पुण्य की भांति पवित्र था। उनकी आंखें कमल की पंखुडि़यों जैसी थीं। ऐसे ज्ञानी, गुणी, युक्तिवादी और आत्मविश्वासी नरेंद्र का मिलन हुआ निर्धन, निरक्षर पुजारी श्री रामकृष्ण के साथ। श्री रामकृष्ण देव दक्षिणेश्वर में भवतारिणी काली माता की पूजा करते थे। अपने जीवन में उन्होंने भगवान के अलावा किसी को नहीं चाहा था। उन्होंने न कभी कोई भाषण दिया, न प्रचार किया, न कोई पुस्तक लिखी। दुर्गम हिमालय की गुफाओं में तपस्या करने भी वो नहीं गए। जनबहुल कलकत्ता नगरी के पास दक्षिणेश्वर के काली मंदिर में ही लगभग 30 वर्ष तक रहे। विजय कृष्ण गोस्वामी, केश्वचंद्र सेन, शिवनाथ शास्त्री आदि ब्रह्म समाज के नेतागण इस नरीक्षर, अद्भुत मनुष्य के चरणों तले स्तब्ध होकर घंटों बैठे रहते और मंत्रमुगध हो उनके श्रीमुख से भगवत प्रसंग सुनते रहते और उनकी भाव समाधि देखकर हैरान हो जाते।  सोचते शास्त्र आदि का अध्ययन न करने पर भी ऐसी सुंदर बातें, जो हमें नहीं मालूम, ये कैसे बताते हैं। दिखने में रामकृष्ण देव पागलों की तरह थे। अपने कपड़ों का होश नहीं था, लेकिन जब मां के नाम का गुणगान करते तो सुनने वालों के हृदय में तीर की तरह बिंधा जाता और हृदय मानो फटने लगता। काली मां को ही उन्होंने अपना भगवान माना था, उन्हीं को ही ब्रह्म माना, छोटे बच्चे की तरह हमेशा मां मां कहते रहते। नरेंद्र ने रामकृष्ण के सामने दिल खोलकर गाया, जिसे सुनकर श्री रामकृष्ण देव भाव समाधि में मग्न हो गए। भजनादि के खत्म होने पर श्री रामकृष्ण ने नरेंद्र के पास आकर उनसे एक दिन  दक्षिणेश्वर आने के लिए आग्रहपूर्वक अनुरोध किया और शिष्टाचार वश नरेंद्र ने आने का वचन दे दिया। नरेंद्र थोड़ा जवान हो चुके थे। उन्होंने एम.ए की परीक्षा दी। यह सन् 1881 नवंबर की बात है। नरेंद्र एम.ए की परीक्षा में व्यस्त थे इसलिए दक्षिणेश्वर जाने की बात भूल गए।              

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