सभ्य समाज के लिए सहिष्णुता जरूरी

शक्ति चंद राणा

लेखक, बैजनाथ से हैं

 

समाज को इस बढ़ती हुई असहनशीलता, हिंसात्मक प्रवृत्ति को रोकने के बारे में सोचने की जरूरत है। सहनशीलता का गुण समाज के परिपक्व होने का परिचायक है, जबकि असहशीलता के कारण हमें उद्दंड तथा झगड़ालू होने, हमारे भीतर हिंसक पशुओं के समान दुर्गुणों के कारण असभ्य श्रेणी में गिना जाने लगता है…

सभ्यताओं के विकास के साथ मानव जीवन में भी विकास हुआ है या मानव जीवन में हुए विकास को सभ्यताओं में आए बदलाव से जोड़कर देखा जाए। इस अध्ययन से एक बात तो स्पष्ट है कि मानव ने उत्तरोत्तर जीवन के हर क्षेत्र में विकास करते हुए स्वयं को प्राणियों में श्रेष्ठ बनाने की गति को निरंतर बनाए रखा है। वह चाहे समाज, विज्ञान हो अथवा शिक्षा या कोई अन्य पहलू। गुफाओं के जीवन की आधुनिक जीवन से यदि तुलना करें, तो साफ दृष्टिगोचर होता है कि हमने अपने रहन-सहन, व्यवहार, जीवनशैली में क्रांतिकारी परिवर्तन लाकर स्वयं को बदलने का प्रयास किया है और उसमें सफल भी हुए हैं। अब से दस-बीस वर्ष पहले के समय को देखें, तो समाज में नारी के प्रति सोच में आज बदलाव होता दिखाई पड़ रहा है। पहले चूल्हे, चौके तक सीमित समझी जाने वाली नारी अब ड्राइंग रूम की शोपीस न रहकर जीवन के हर एक पहलू में अपना योगदान पुरुष के साथ मिलकर दे रही है। किसी भी समाज को विकसित या अविकसित जैसे नाम देने से पहले वहां महिलाओं के जीवन का सापेक्ष आकलन कर पता लगाया जाता है कि उनकी स्थिति समाज में क्या है। सभ्यता के पोषण, परिपालन और विकास में मां और भार्या के रूप में नारी का स्थान अति सम्मान वाला है, वंदनीय है, लेकिन समाज में उत्पन्न विकृतियों, विसंगतियों का शमन समाधान भी समय की जरूरत रहती है। जो समाज स्वयं इस बदलाव को स्वीकार नहीं करता, वह समाज विश्व प्रतिस्पर्धा में सदैव पिछड़ जाता है। यही कारण है कि नारी शिक्षा व उसके उत्थान पर अधिक बल दिया जाता है।

नारी सशक्तिकरण के प्रति हर सरकार पहल करती नजर आ रही है। अब पहले की अपेक्षा लोग या समाज दहेज हत्याओं से भी गुरेज करने लगा है। अब कन्या भ्रूण हत्या को लेकर भी समाज की सोच में परिवर्तन देखने को मिल रहा है, जो इस बात का परिचायक है कि हम धीरे-धीरे इस बदलाव को स्वीकार कर रहे हैं। आज यदि तीन तलाक के विरोध में स्वर मुखर हुए हैं, तो उसके पीछे के मानवीय पहलू अथवा भाव को ही वरीयता से देखा जाना चाहिए, न कि राजनीतिक दृष्टिकोण से। नारी नारी है, वह चाहे किसी भी धर्म, जाति, संप्रदाय से है। अन्याय अन्याय है, वह चाहे किसी से भी, कहीं भी हो रहा हो, उसका प्रतिकार होना ही चाहिए। कन्या भ्रूण हत्या एक सामंतवादी अथवा विकृत मानसिकता का प्रतीक है। सदियों पहले हुए नारी पर अत्याचारों के दुष्प्रभाव ने पुरुष मानसिकता को कन्या को लेकर इतना अधिक संकीर्ण बना दिया है कि वह अपनी अज्ञानता, अनपढ़ता के कारण ऐसे पग उठाने में देर नहीं करता, लेकिन अधिकतर देखा गया है कि नारी ही नारी की शत्रु हो जाती है। जन्म ले रही कन्याओं के प्रति समाज की असहनशीलता वाली सोच ने सबसे अधिक नुकसान पहुंचाया है। यह असहनशीलता केवल कन्याओं अथवा महिलाओं के प्रति ही नहीं देखने को मिलती, यह तो जीवन के पग-पग पर घर-परिवारों, दफ्तरों, कर्मशालाओं, बड़े-बड़े इदारों से चलकर सड़कों पर भी साफ देखने को मिलती है। जब जरा-जरा सी बात को लेकर सड़क पर न केवल मारपीट, अपितु एक-दूसरे की आवेश में आकर हत्या कर दी जाती है। समाज को इस बढ़ती हुई असहनशीलता, हिंसात्मक प्रवृत्ति को रोकने के बारे में सोचने की जरूरत है। कई घरों में बहुओं, बेटों का अपने वृद्ध माता-पिता, सास-ससुर के प्रति व्यवहार अति निंदनीय देखा जाता है, जो कतई अच्छा नहीं कहा जा सकता। जमीन-जायदाद को लेकर बढ़ते विवादों में एक-दूसरे पर होती गालियों की बौछार गोलियोें तक चली जाती है और हम कितने ही परिवारों को इन जमीन-जायदाद के मसलों में बर्बाद होते देखते हैं। आसपास पड़ोसियों में छोटी-छोटी बातों को लेकर विवाद, हिंसा, मारपीट और मुकदमेबाजी तक बढ़ जाते हैं। सभ्य और शिक्षित समाज में ऐसी घटनाएं असहनशीलता की भावना को ही प्रदर्शित करती हैं। सही मायनों में मानव जीवन की यह सच्चाई भी है कि इतना सुकून, शांति और खुशी हमें स्वयं को स्वार्थी होकर हासिल नहीं होती, जितनी हमें दूसरे के प्रति निस्वार्थ भाव से सहायता, सेवा करने से मिलती है।

इससे समाज में हर व्यक्ति जब इसी भाव से सोचने लगता है कि ‘मैं अपना सुख और लाभ न सोचकर दूसरे के प्रति सहज और सहायतापूर्ण भाव रखूं’, तो वह समाज अत्यंत शिष्ट और सभ्य की श्रेणी में ही आएगा। यह तभी होगा जब हम दूसरे को हानि पहुंचाने के भाव की जगह अपने भीतर असहिष्णुता, असहनशीलता के भाव का त्याग कर दूसरों के प्रति प्रेम, आदर भाव रखने की आदत डालने का प्रयास करेंगे। सहनशीलता का गुण समाज के परिपक्व होने का परिचायक है, जबकि असहशीलता के कारण हमें उद्दंड तथा झगड़ालू होने, हमारे भीतर हिंसक पशुओं के समान दुर्गुणों के कारण असभ्य, अशिष्ट भाव रखने वाली श्रेणी में गिने जाने वालों में रखा जाता है। सहनशीलता न केवल दूसरे मनुष्यों के प्रति आवश्यक है, अपितु पशुओं, प्राकृतिक जीव-निर्जीव सबके प्रति ही आवश्यक है, क्योंकि भगवान तो कण-कण में हैं, जड़-चेतन सब में समाए हुए हैं। इसलिए सभी के प्रति हमारा आदर भाव होना जरूरी है।

वैसे इन चीजों के बारे में बचपन से ही बच्चों को घर तथा स्कूल से शिक्षण-प्रशिक्षण दिया जाना जरूरी है। बच्चों को अभिभावक उदार बनाएं, न कि आत्मकेंद्रित। यदि उनमें हर चीज बांट कर खाने की आदत आरंभ से ही डालने का प्रयास होगा, तो बड़े होकर बच्चे जीवन में वैसा ही व्यवहार करेंगे। अतः अभिभावक तथा अध्यापक दोनों ही बच्चों को असहनशील बनाने की जगह सहनशील बनाने का प्रयास करें। उदार बनाएं, न कि उसकी सोच को समाज के प्रति कट्टरता का रंग चढ़ाएं। यह समाज, राष्ट्र तथा विश्वहित में होगा।

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