समयाभाव के कारण पढ़ने में रुचि कम

प्रकाशक और पुस्तक के गठजोड़ में लेखक और पाठक दोनों आते हैं। लेखक के लिए पुस्तक एक कृति तो प्रकाशक के लिए उत्पाद है जो पाठक नामक ग्राहक के लिए है। यह ग्राहक एक व्यक्ति भी हो सकता है और कोई पुस्तकालय भी। यह पाठक अपनी रुचि के अनुसार ही पुस्तक खरीदता है, पढ़ता है और संतुष्ट होता है। यह संतुष्टि उसे अखबार से भी मिलती है और पत्रिकाओं से भी। गंभीर साहित्य से वह बचना चाहता है। प्रायः यह मनन करने वाला विषय उसे पसंद नहीं। यह देखा गया है कि बहुत सी पुस्तकें अलमारियों में बिना पाठक के रह जाती हैं और एक अवधि के बाद ‘वीड आउट’ हो अलमारी से खारिज भी हो जाती हैं। यदि गौर से देखा जाए तो यह स्थिति हिंदी साहित्य क्षेत्र में ही अधिक है। मेरा मानना है कि पढ़ने के बारे में रुचि-अरुचि आदमी के भीतर होती है। रुचि को जगाना पड़ता है, मगर जीवन के झंझावातों से उपजा समयाभाव उसे इस ओर आने ही नहीं देता। एक छत के नीचे पुस्तकों की अनुपलब्धता भी उसके चयन में बाधा डालती है। कमोबेश वह यदि साहित्य की ओर प्रेरित भी होता है तो पुस्तकों की कीमतें उसे रोकती हैं। वे प्रायः सामान्य पाठकों की पाकेट से बाहर होती हैं। ऐसे में पाठक अपनी संतुष्टि लुगदी साहित्य और सोशल मीडिया से पूरी कर लेता है। उसके मनोरंजन के लिए टीवी सीरियल भी मदद करते हैं। माकूल प्रचार का अभाव भी पाठक को पता ही नहीं चलने देता कि उसके लिए बाजार में क्या नया आया है? आज सोशल मीडिया ने भी पाठकीयता पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है। बहुत कुछ नेट पर मिल जाता है। अब साहित्य उसकी पाकेट में ही होता है। पाठक तैयार करने में जिन तत्त्वों (माता-पिता से अध्यापकों तक) की अहम भूमिका होती है, वे भी निष्क्त्रिय हैं। हिमाचल प्रदेश के संबंध में इतना कि वर्ष 1986-87 के आसपास एक योजना बनी थी कि राज्य की सभी वरिष्ठ माध्यमिक पाठशालाओं को सार्वजनिक पुस्तकालय बना दिया जाए और ग्रामीण जनों को वहां पुस्तकें उपलब्ध कराई जाए। इसके लिए अलग विंग का प्रावधान भी किया था। पुस्तकों की थोक खरीद भी आरंभ की गई थी, मगर उसे आंशिक रूप में ही लागू किया गया। एक सार्वजनिक पुस्तकालय एक्ट बनना था, नहीं बना। अब पुस्तकें खरीदी तो जाती हैं, मगर अधिकांश बोरियों में ही बंद रहती हैं। पाठशालाओं में मनोरंजन गतिविधियां कितनी साहित्य से संबंधित होती हैं, कह नहीं सकता।

 

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