समाज हित जीवन का लक्ष्य हो

आपके पास जो कुछ भी है, सब भगवान का है। आप तो उन सबकी यथायोग्य सेवा और सदुपयोग करने के लिए भगवान के द्वारा नियुक्त किए हुए मुनीम हैं। आपने उन वस्तुओं को अपनी और अपने भोगसुख के लिए ही मिली हुई मान लिया है, यही आपकी गलती है। सेवा से मुंह मोडि़ए नहीं और अपना कुछ भी मानिए नहीं। ईमानदार मुनीम मालिक के कारोबार की देखरेख और संभाल पूरी सावधानी के साथ करता है, परंतु अपना कुछ भी नहीं मानता। वह वफादारी से सजग रहकर काम न करे, तो नमकहराम होता है और मालिक के धन पर मन चलाए तो बेईमान। धन साथ नहीं जाता, वह यहीं रह जाता है। धन को अपना न मानकर मानव कल्याण के कार्य में उसका उपयोग करना चाहिए। निर्मल भाव से सबकी सेवा करनी चाहिए। प्रेम में ऊंच-नीच की भावना न होकर बराबरी का भाव होता है। माता, पत्नी या मित्र अपनी संतान, पति या मित्र की सेवा करते हैं, उनके मन में यही रहता है कि किस प्रकार स्वाभाविक सेवा से हम उन्हें सुख पहुंचा सकें। इस त्याग में उन्हें कभी क्षोभ नहीं होता है।  उसमें कभी उकताहट नहीं होती और न ऐसी सेवा की कोई सीमा ही निर्धारित होती है। जितनी हो उतनी ही थोड़ी! इसमें न उपकार की भावना और न बदले की। न कभी एहसान बताया जाता है और न मन में कोई गौरव या अभिमान होता है।  इस सेवा में उत्साह और सेवाभाव बढ़ता ही रहता है। इसमें की हुई सेवा की स्मृति नहीं रहती, क्योंकि यह सेवा उपकार रूप नहीं होती, यह तो आत्मसुख संपादन की चेष्टामात्र होती है। मैंने किसी का उपकार किया है, इसी प्रकार प्रेमभाव से की हुई पर सेवा में भी स्वभाव रहने से उपकार की भावना नहीं होती। प्रेम भाव न हो तो दया से सेवा करनी चाहिए। प्रेम की भांति दया में सेवा ग्रहण करने वाले के प्रति सम्मान का शुद्धभाव सेव्यभाव नहीं रहता और न बराबरी का भाव ही रहता है। संसार में कोई भी स्वाभिमानी जीव दूसरों की दया का पात्र नहीं बनना चाहता। बाध्य होकर बनना पड़ता है, दया पाया हुआ मनुष्य दब सा जाता है। उसमें बराबरी के भाव से सिर ऊंचा करने की हिम्मत प्रायःनहीं रह जाती! ऐसा करने पर उसे कृत्घन या अकृतज्ञ समझे जाने का डर रहता है! यह बात प्रेम में नहीं है इसलिए प्रेम का स्तर दया से कहीं ऊंचा है।  दया साधुपुरुष का स्वभाव होता है। जो हृदय बड़े से बड़े दुख में भी सदा निर्विकार, सम और अचल रहता है, वही पराए दुख को देखकर उससे जलने लग जाता है और तुरंत ही पिघल जाता है। उससे वह दुःख सहन नहीं होता! तुलसीदास जी ने कहा है।

संत हृदय नवनीत समाना! कहा कबिन्ह परि कहै न जाना !

निज परिताप द्रवइ नवनीता ! पर दुख द्रवहिं संत सुपुनीता !!

कवियों ने संत हृदय को मक्खन के सामान कोमल बताया है, पर असल में वे संत हृदय का यथार्थ निरूपण नहीं कर सके, क्योंकि मक्खन तो स्वंय ताप पाकर पिघल जाता है, परंतु संत अपने ताप से कभी नहीं पिघलते! वे अपने दुःखों की जरा भी परवाह नहीं करते! महान पवित्र आत्मा सस्नत को दूसरों के ताप से द्रवित होते हैं! पर दुःख देखकर दयालु पुरुष के हृदय में दया का पवित्र आवेश होता है और उस आवेश का इतना प्रभाव होता है कि उस समय उसे यह भी पता नहीं रहता कि यह दुःखी पुरुष, जिसके दुःख को देखकर दया का आवेश हुआ है, अपना है या परायाय मित्र है या शत्रु! शास्त्र में कहा है।

परे वा बंधुवर्गे वा मित्रे द्वेष्टरि वा तथा।

आपन्ने रक्षितव्यं तु दयैषा परिकीर्तिता॥

पराए हों या अपने,मित्र हों या वैरी, किसी को भी दुःख में देखकर रक्षा करने कि जो स्वाभाविक चेष्टा होती है, उसी का नाम दया है। शुद्ध दया के भाव से हुई सेवा में एहसान बताने कि भावना नहीं रह सकती। वहां तो दया की वृत्ति से हृदय इतना प्रभावित होता है कि दुःख को दुःख से बचाने का सक्रिय प्रयत्न किए बिना उसमें शांति होती ही नहीं। सारांश यह कि दयालु पुरुष भी दीनों की सेवा अपने ही चित्त की प्रसन्नता और शांति के लिए करता है। जहां अपने पराए का भेद है। अपना या अपना मित्र हो तो दुःख दूर करने कि चेष्टा कि जाए। यह शुद्ध दया का कार्य नहीं है। आजकल जो उपकार या सेवा कार्य होता है, वह प्रायःशुद्ध दया का भी नहीं होता, ईश्वर बुद्धि या प्रेमभाव की तो बात ही दूसरी है। सेवा करके या किसी को देखकर तो उसे भूल ही जाना चाहिए। ऐसी चेष्टा तो कभी होनी ही नहीं चाहिए,जिससे आपके द्वारा किसी समय सेवा प्राप्त किए हुए मनुष्य को सकुचाना पड़े, सेवा ग्रहण करने के लिए पश्चाताप करना पड़े, अपने हार्दिक शुभ विचारों को दबाना या छोड़ना पड़े और बदला उतारने के लिए चेष्टा करनी पड़े।  किसी को कुछ देना हो तो चुपके से दे देना चाहिए, जिससे दूसरों के सामने उसको अपमानित न होना पड़े। दान सदा गुप्त रखना चाहिए। कभी उसके लिए उस पर एहसान नहीं करना चाहिए और न उस पर किसी बात के लिए दबाव डालना या उससे बदला चुकाने की आशा रखनी चाहिए। भगवन की चीज समाज के काम में लगी समझकर प्रसन्न होना चाहिए ।

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