समृद्ध है कबायली संस्कृति

हिमाचल प्रदेश कला, संस्कृति और सभ्यता के लिए समूचे राष्ट्र में एक अलग पहचान रखता है। प्रदेश में भी विशेषकर कबायली सभ्यता और संस्कृति काफी समृद्ध है। हिमाचल प्रदेश में किन्नौर, लाहुल-स्पीति, चंबा, शिमला तथा सिरमौर जिला में ये कबीले रहते हैं। बहरहाल हिमाचल प्रदेश के ऊपरी भाग के कबायलियों को अनुसूचित जनजाति तथा उस क्षेत्र को अनुसूचित जनजातीय क्षेत्र केंद्र सरकार बहुत पहले घोषित कर चुकी है…

गतांक से आगे …

हाटी क्षेत्र में माघी त्योहार : हिमाचल प्रदेश कला संस्कृति और सभ्यता के लिए समूचे राष्ट्र में एक अलग पहचान रखता है। प्रदेश में भी विशेषकर कबायली सभ्यता और संस्कृति काफी समृद्ध है। हिमाचल प्रदेश में किन्नौर, लाहुल-स्पीति, चंबा, शिमला तथा सिरमौर जिला में ये कबीले रहते हैं। बहरहाल हिमाचल प्रदेश के ऊपरी भाग के कबायलियों को अनुसूचित जनजाति तथा उस क्षेत्र को अनुसूचित जनजातीय क्षेत्र केंद्र सरकार बहुत पहले घोषित कर चुकी है, जबकि इसके विपरीत सिरमौर जिला के रेणुका तथा शिलाई क्षेत्र कबायली भी सरकार की इस मान्यता से वंचित है। सिरमौर जिला के गिरिपार क्षेत्र में रहने वाले कबायली अपने आप को ‘हाटी सभ्यता’ से जुड़ा मानते हैं। यद्यपि ‘हाटी कबीले’ और उत्तर प्रदेश के ‘जौंसारी कबीले’ की भौगोलिक स्थिति में भी समरूपता है, खान-पान, रहन-सहन, पहनावा, सभ्यता, संस्कृति में एकरूपता है तथा आर्थिक, सामाजिक एवं धार्मिक मान्यताएं एवं परंपराएं भी एक-दूसरे से बिलकुल मेल खाती है, लेकिन इसे विडंबना ही कहा जा सकता है कि सिरमौर जिला के गिरिपार क्षेत्र को केंद्र सरकार से अनुसूचित जनजातीय क्षेत्र का दर्जा प्रदान नहीं किया गया। सिरमौर के गिरिपार क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति तथा जलवायु के कारण कई मेले व तीज त्योहार इस क्षेत्र में विशेष रूप से मनाए जाते हैं। उसी कड़ी में माघी त्योहार इस क्षेत्र में अपना अलग से महत्त्व रखता है। पौष महीने के आखिरी दिनों में हर वर्ष यह ‘माघी त्योहार’ बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है तथा स्थानीय भाषा में इस त्योहार को ‘त्यार’ के नाम से जाना जाता है। इस त्योहार को खाने पीने तथा मौज-मस्ती के लिए मनाया जाता है तथा क्षेत्र में पांच दिनों तक अलग-अलग दिन में अलग-अलग पकवान एवं व्यंजन बनाए जाते हैं। इन प्रचलित पकवानों में पहले दिन को ‘मुड़ांटी’ कहते हैं तथा इस दिन गेहूं, चावल, तिल, भंग के दानों एवं चौलाई के उबाले हुए भूने हुए अनाज के दानों से भिन्न-भिन्न किस्म का ‘मूड़ा’ बनाया जाता है, तिल तथा चौलाई के गुड़ की चाशनी में लड्डू बनाए जाते हैं, जो स्थानीय भाषा में ‘तेलवे’ के नाम से प्रचलित है। दूसरे दिन त्योहार को ‘उसकांटी’ कहते हैं, उस दिन नरम पत्थर के सांचे में तराशी गई ‘अस्कापरी’ पर ‘असकली’ बनाई जाती है, जिसे शक्कर, घी एवं राजमाह व माह की दाल के साथ खाया जाता है। तीसरे दिन के त्योहार को ‘डिमांटी’ कहते हैं। इस दिन गुड़ की चाशनी बनाकर उसमें आटा डालकर ‘रुडवे’ से मिलाकर पकाया जाता है इसे ‘आटा घडणा’ पकवान कहते हैं।

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