सांस्कृतिक नीति की ओर हिमाचल

अंततः हिमाचली कलाकार की पहचान सुनिश्चित करती नीति में संस्कृति को नजदीक से पूजने की इच्छाशक्ति तो दिखाई दी। फिलहाल लोक कलाकारों का पंजीकरण शुरू हुआ है, ताकि राज्य के सामर्थ्य में चल रहे सांस्कृतिक समारोहों में इनके हुनर को समर्थन मिले। यह दीगर है कि प्रदेश कला, भाषा एवं संस्कृति विभाग का सदैव भाषायी नेतृत्व रहा, लिहाजा कला और कलाकार का प्रतिनिधित्व माकूल नहीं दिखाई दिया। ऐसे में कलाकारों की स्वाभाविक मांग यहां तक भी पहुंची कि उनकी बेहतरी के लिए अलग से नेतृत्व, अकादमी के प्रारूप में संशोधन या इसका अलग से गठन कर दिया जाए। बहरहाल सांस्कृतिक नीति की परिभाषा में लोक कलाकार के अस्तित्व को मंच पर पेश करने की नई व्याख्या शुरू हुई है, हालांकि इस परिधि में पूरे परिवेश का सांगो-पांग वर्णन पहले से मौजूद है। प्रदेश की सांस्कृतिक नीति कहां तक देख पाती है या इसका दायरा कितना विस्तृत तथा उद्देश्यपूर्ण होता है, अभी कहा नहीं जा सकता। कला और कलाकार की पहचान में राज्य का प्रश्रय बेशक नीति निर्धारण से स्पष्ट और पारदर्शी होगा, लेकिन कार्यान्वयन के लिए जब तक कोई विशेष एजेंसी या प्राधिकरण का गठन नहीं होगा, इस वर्ग को शायद ही न्याय मिलेगा। प्रदेश के विभिन्न मेलों, सांस्कृतिक समारोहों या आयोजनों की रूपरेखा फिलहाल न अनुशासित है और न ही मापदंड निर्धारित हैं। इसीलिए राजनीतिक प्रभाव से इनका संचालन होने लगा है और बिना तर्क के इनका स्तर जिला, राज्य, राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय घोषित कर दिया जाता है। अगर सांस्कृतिक नीति की पहल इन सारे विषयों की व्यापकता में बने, तो ही सार्थक परिणाम आएंगे, वरना ऊना महोत्सव से बड़ा हरोली समारोह हो जाएगा, क्योंकि वहां से कद्दावर नेता ही इसका संरक्षक रहा। सांस्कृतिक समारोहों का वर्गीकरण इनके ऐतिहासिक, पारंपरिक तथा भौगोलिक मान्यताओं व संभावनाओं के अनुरूप करते हुए बजटीय प्रावधान तथा खर्च की सीमा भी तय होनी चाहिए। ये मेले अगर राजनीतिक या प्रशासनिक प्रदर्शन की तस्वीर पेश करेंगे, तो शायद ही किसी नीति का असर होगा। अतः प्रदेश में मेला प्राधिकरण का गठन करके स्वतंत्र रूप से ऐसे समारोहों का संचालन, इनके तहत कार्यक्रमों का निर्धारण तथा कलाकारों को न्यायोचित अवसर मिलेगा। अगर सभी समारोह सूचीबद्ध होंगे, तो प्राधिकरण समय रहते इनकी योजना तथा कलात्मक पहलुआें का प्रबंधन कर पाएगा। इसी के साथ पारंपरिक मेलों के जरिए कुश्ती प्रतियोगिताओं को हिमाचली प्रतिभा से जोड़ा जा सकता है, जबकि कई स्थानों पर सांस्कृतिक तथा खेल प्रतियोगिताओं का बीड़ा भी उठाया जा सकता है। अब तक होता यह रहा है कि कुछ कलाकारों को कई समारोहों में सियासी प्रभाव से मंच मिल जाता है, जबकि अन्य के लिए निष्पक्षता की परख के लिए कोई पद्धति ही दिखाई नहीं देती। बाहरी कलाकारों को ढोने के लिए कुछ खास संपर्कों से हासिल दलाली खा रहे लोग सक्रिय हैं, जबकि एक पद्धति और प्रक्रिया के तहत वार्षिक अनुबंध होने चाहिएं। मेला प्राधिकरण जैसी एजेंसी न केवल आयोजनों का संचालन, कलाकारों का मंचन व वित्तीय प्रबंधन करेगी, बल्कि वांछित अधोसंरचना के विकास में अपनी भूमिका निभाएगी। इसी के साथ सांस्कृतिक परिदृश्य की जरूरतें और संभावनाएं जब आगे बढ़ेंगी, तो राज्य का मनोरंजन कैलेंडर और परिपक्व होगा। मेला प्राधिकरण के साथ मिलकर पर्यटन मेले, फूड फेस्टिवल, धार्मिक त्योहार तथा ग्रामीण मेलों को नया आधार दिया जा सकता है। सांस्कृतिक नीति के हवाले से हर छोटे-बड़े शहर में सभागारों व ओपन एयर थियेटर का निर्माण तथा कला मेलों का आयोजन किया जा सकता है। अकेले अपने दम पर कला-संस्कृति विभाग सफल नहीं होगा, बल्कि पर्यटन, सूचना व शिक्षा विभाग मिलकर ही सांस्कृतिक नीति को प्रभावी बना सकते हैं।

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