साहित्य से पहले रोटी के जुगाड़ में पाठक

डा. अशोक गौतम

यह प्रश्न लेखन जगत में स्वयं भी इन दिनों बड़ा उछल रहा है और उछाला भी जा रहा है कि साहित्य को पाठक नहीं मिल रहे या कि साहित्य पाठकों से दूर होता जा रहा है। साहित्य के लिए यह प्रश्न गंभीर न होते हुए भी गंभीर है। उस साहित्य के लिए जो समाज के नवनिर्माण में अपने होने से लेकर आज तक महत्ती भूमिका निभाता रहा है। उस साहित्य के लिए जिसने समाज में अपने माध्यम से क्रांति तक लाकर उस समय के समाज की दशा और दिशा बदलने की हिम्मत दिखाई हो। सवाल चाहे जो भी हों! दिक्कत चाहे कहीं भी हो! पर सच यह है कि आज का पाठक अपने समय के साहित्य से कट रहा है। साहित्य की विधा चाहे कहानी हो या कविता, निबंध हो या इतर साहित्य की दूसरी विधाएं। कुछेक साहित्यिक विधा मसलन व्यंग्य को छोड़कर पाठकों की संख्या में निरंतर कमी हो रही है। कई कारण हैं इसके। हो सकता है आज की भागदौड़ की जिंदगी में ताबड़तोड़  भागते पाठकों को साहित्य पढ़ने को वक्त ही न निकल रहा हो। उनके सामने साहित्य से पहले रोटी के सवाल खड़े हों। यह भी हो सकता है कि जिस ढंग का साहित्य पाठक चाहता हो या कि जिस तरह का साहित्य पाठकों को दिया जाना चाहिए, उसका कहीं ध्यान ही न हो।

हम साहित्य के नाम पर वैयक्तिक अनुभूतियों को पाठकों पर थोपना तो नहीं चाह रहे कहीं? अगर ऐसा हो रहा है तो ऐसा होना भी इसकी एक वजह हो सकती है कि साहित्य में पाठकों का संकट आ गया हो। यह भी सच है कि साहित्य प्रकाशन के तमाम आसानी से उपलब्ध तरीकों के बावजूद साहित्य को पाठक नहीं मिल रहे। यह सच है। आज फेसबुक, व्हाट्सएप तक साहित्य का कल्याण नहीं कर पा रहे। बस, लाइक्स तक सब सिमट रहा है। कमेंट्स न के बराबर। बधाइयां अधिक। एक और वजह, आज बाजार साहित्य और पाठकों के बीच एक दीवार बनकर उभरा है, रास्ता बनकर नहीं। बाजार साहित्य की पुस्तकों के रेट इतने रख देता है कि आम पाठक अगर चाहे भी तो वह उस किताब को उल्ट-पलट कर उससे किनारा कर लेता है।

एक वजह यह भी है कि साहित्य से बाजार ने भी पाठक को दूर किया है। इसीलिए कभी पाठकों के बीच रहने वाला साहित्य आज पुस्तकालयों के बीच रहने वाला साहित्य होता जा रहा है। अब एक और कारण! साहित्य का उद्देश्य आरंभ से ही रस की प्राप्ति रहा है, आनंद रहा है। आनंद, रस के आज और भी कई माध्यम उपलब्ध हैं। अब पाठक, पाठक होने से अधिक श्रोता होकर आनंद ले रहा है, दर्शक होकर आनंद ले रहा है। उसके पास अब पढ़कर आनंद लेने का समय नहीं। उसके पास अब पढ़ते हुए कल्पना करने का समय नहीं। उसके हाथ में आनंद, रस के बीसियों बटन हैं। दबाए, जो चाहे देखा। किताब ढूंढने की जरूरत नहीं। जो चाहे, सुना। जैसे भी वक्त मिला। जब शब्द दृश्यों में बदल जाएं तो ऐसा होना स्वाभाविक ही होता है। साहित्य को पाठक मिलने के लिए जरूरी है कि पुस्तक मेलों के साथ-साथ पाठक मेले भी हों।

 

 

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