सिखों को लुभाने की रणनीति

प्रधानमंत्री मोदी ने दिवंगत पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी का मुद्दा अचानक ही नहीं उठाया। राजीव गांधी की हत्या को 28 लंबे साल बीत चुके हैं। राजनीति ने कई करवटें बदली हैं और प्रसंग भी बदल चुके हैं। इस दौर में बोफोर्स तोप सौदे का घोटाला भी प्रासंगिक नहीं है। आरोपित पक्ष या तो दिवंगत हो चुके हैं अथवा विदेश भगा दिए गए हैं। दिल्ली उच्च न्यायालय ने 2004 में बोफोर्स केस ही खारिज कर दिया था, बेशक कारण कुछ भी रहे हों। उस अदालती निर्णय को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती नहीं दी गई। दस साल तक कांग्रेस नेतृत्व की यूपीए सरकार केंद्र में रही और मई, 2014 में मोदी प्रधानमंत्री  बने। तब तक देर इतनी हो चुकी थी कि शीर्ष अदालत में अपील करना ही बेमानी था। वैसे भी हमारी संस्कृति और परंपरा रही है कि एक व्यक्ति के देहावसान के बाद उसके पापों, कुकर्मों, अपराधों पर चर्चा तक नहीं की जाती। उसे निष्कलंक मान कर माफ कर दिया जाता है, लेकिन चुनावी राजनीति में कुछ भी संभव है। प्रधानमंत्री मोदी ने एक जनसभा में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी को ‘भ्रष्टाचारी नंबर वन’ करार दे दिया। प्रधानमंत्री ने चुनावी लड़ाई को ‘चौकीदार चोर है’ बनाम ‘भ्रष्टाचारी नंबर 1’ के जरिए शेष चुनाव को नया मोड़ देने की कोशिश की थी या यह मुद्दा प्रधानमंत्री की किसी बौखलाहट और कुंठा को दर्शाता है अथवा प्रधानमंत्री मोदी किसी भी सूरत में भ्रष्टाचार के मुद्दे को छोड़ना नहीं चाहते। मौजूदा आम चुनाव में पांच चरणों का मतदान हो चुका है। लोकसभा की 424 सीटों पर जनादेश ईवीएम में बंद हो चुका है। शेष दो चरणों में 118 सीटों पर मतदान 12 और 19 मई को होने हैं। अंततः 23 मई को जनादेश की निर्णायक घोषणा…! स्वाल यह है कि अंतिम दो चरणों के चुनाव के मद्देनजर प्रधानमंत्री मोदी ने कांग्रेस को चुनौती क्यों दी कि वह राजीव गांधी और बोफोर्स घोटाले पर चुनाव लड़े? कांग्रेस दिल्ली, पंजाब और भोपाल में पूर्व प्रधानमंत्री के मान-सम्मान के मुद्दे पर चुनाव लड़ ले? देखिए, क्या खेल खेला जाता है? प्रधानमंत्री की इसी चुनौती में उनकी रणनीति निहित है। अभी पूरे पंजाब, हरियाणा, हिमाचल और दिल्ली समेत उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, झारखंड और पश्चिम बंगाल आदि राज्यों की 118 सीटों पर मतदान शेष है। प्रधानमंत्री और भाजपा की रणनीति के मुताबिक चूंकि कुछ राज्यों में तो सिखों की आबादी घनी है, लिहाजा 1984 के सिख-विरोधी दंगों पर शेष चुनाव लड़ा जाना चाहिए। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक उन दंगों में 2733 मासूम सिखों का कत्लेआम किया गया था। यह आंकड़ा ज्यादा भी हो सकता है। भाजपा उस नरसंहार को भुनाना चाहती है  और अंततः सिखों को अपने पक्ष में लुभाते हुए लामबंद करना चाहती है। सिख-विरोधी दंगे कांग्रेस की नाजुक रग रहे हैं। यदि राजीव गांधी पर चर्चा शुरू होती है, तो वह बयान भी सामने आएगा कि जब बड़ा पेड़ गिरता है, तो जमीन हिलती ही है। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या पर राजीव गांधी ने यह बयान दिया था और उसके बाद दंगे भड़के और फैले थे। इस मुद्दे ने नया मोड़ तब ले लिया, जब दिल्ली विश्वविद्यालय के कांग्रेस समर्थक अध्यापकों ने प्रधानमंत्री मोदी के मुद्दे का विरोध किया और खंडन भी किया, लेकिन प्रतिक्रिया में भाजपा समर्थक 128 अध्यापकों ने एनडीए उम्मीदवारों को वोट देने का आह्वान किया। गांधी परिवार के दामाद रॉबर्ट वाड्रा ने इसे ‘गटर पॉलिटिक्स’ करार दिया। राहुल-प्रियंका गांधी ने प्रधानमंत्री मोदी की तुलना ‘दुर्योधन’ से की। यह भी कहा कि मोदी शहादत के नाम पर वोट मांगते रहे हैं, लेकिन उनके परिवारों के ‘शहीदों’ का अपमान करने पर तुले हैं। ऐसी राजनीति के कारण सभी मौजूदा और महत्त्वपूर्ण राष्ट्रीय मुद्दे नेपथ्य में जा रहे हैं। यह भी हमारी चुनाव प्रक्रिया की विडंबना है।

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