सियासी वादों का सच

– रूप सिंह नेगी, सोलन

कहा जाता है कि वोट उसे देना चाहिए, जो कम से कम वादे करे, ताकि बाद में जनता की निराशा का सबब न बने। 2014 में जो ढेर सारे लोकलुभावने वादे किए गए थे, उनमें से लगता नहीं है कि किसी वादे को धरातल पर उतारा गया होगा। यदि वादे पूरे किए होते, तो न जनता में निराशा पैदा होती और न ही ताबड़तोड़ रैलियां व प्रचार करने की जरूरत पड़ती। ऐसी परिस्थिति में बेचारी जनता कैसे विश्वास कर पाएगी कि 2019 में किए जा रहे वादों को अमलीजामा पहनाया जाएगा। सवाल उठता है कि आखिर  कब तक जनता बार-बार बेवकूफ बनती रहेगी?

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