सुशासन के प्रशासनिक सरोकार

हिमाचल में लोकसभा चुनाव की करवटों में प्रशासनिक सरोकार का सफर मापा जाएगा और बहस के मुहावरे अपनी-अपनी प्रस्तुति देंगे। शिकायतें उभर रही हैं, कुछ साहसिक और कुछ विशुद्ध रूप से राजनीति से ओतप्रोत। जो शासन में थे, वे अधिकारी बदले गए, लेकिन जो प्रशासन में हैं, उनके सरोकारों की समीक्षा में यह चुनाव अपनी मर्यादा घोषित करेगा। शायद इसीलिए आचार संहिता के संघर्ष में लबादा हुए कुछ अधिकारी हमें बता रहे हैं कि सामान्य रूप से सरकारी तंत्र की हैसियत कितनी कमजोर है। हम इसे यूं भी देख सकते हैं कि हिमाचल के आदर्श हमेशा चुनावी आचार संहिता के दौर में दिखते हैं, फिर भी प्रशासनिक सरोकारों की सीरत में एक आदर्श कुनबा हमेशा रहता है। प्रशासन को अमूमन लोग अपनी आशाओं से तोलते हैं, इसी वजह से जनता के प्रति सरोकार साबित होते हैं या प्रत्यक्ष हो जाते हैं। ये योजनाओं के मुहाने पर या परियोजनाओं की प्रगति के सूचक की तरह हाजिरी लगाते हैं। विडंबना यह है कि बहुत कुछ दिखाने के लिए हो रहा है, अनियमित या कभी-कभी। कभी लगता है प्रशासन की चाल इतनी सीधी और स्पष्ट है कि किसी सभा स्थल पर जी हुजूरी पर उतर कर बिछ जाती है, लेकिन प्रभाव की बुनियाद पर जनता के सवाल ढह जाते हैं। फाइलें गौर नहीं करतीं या विकास केवल अद्यतन इतिहास लिखता है। ऐसा नहीं है कि नियम नहीं हैं या कोई भी सरकार पूरी तरह बदलने को तैयार है, लेकिन जो आधारभूत है वह नहीं होता। मसलन राष्ट्रीय स्तर पर चला स्वच्छता अभियान उन भवनों में ही हार रहा है, जहां बडे़-बड़े प्रशासनिक अधिकारी मौजूद रहते हैं। हिमाचल में जिलाधीशों के कार्यालयों के भीतर और बाहर स्वच्छता के लिए कितने नंबर देंगे। आश्चर्य तो यह कि सरकारी प्रांगणों में आवारा पशुओं को खदेड़ने तक की इच्छाशक्ति नहीं बची। जनता केवल फरियादी होती है, इसलिए उसे सरकारी परिसरों में इस्तेमाल के लिए एक अदद टायलट तक नहीं मिलता। इससे न्यायालय परिसर भी अछूते नहीं, तो फिर विकास का अर्थ केवल एहसास का छज्जा है, ताकि वहां बैठकर इमारतें गिनी जाएं। चुनाव के दौरान काफिले आयोग की दृष्टि में संयमित रहते हैं, लेकिन बहुमत सरकार के खर्चों को मापना मुश्किल है। क्या हम खर्चों में हिमाचल को बोझ उठाने के काबिल बना पाए या केवल सियासी डंके का डंक भुगत रहे हैं। जो भी हो यह स्पष्ट है कि हिमाचल में सुशासन के सरोकार भी सिरफिरों की चौपाल पर तय हो रहे हैं, इसलिए जरूरत से अधिक भी, जवाबदेही में कम हो जाता है। जिस प्रदेश में पशुओं का चारा भी पंजाब की मंडी से आता हो, वहां दुग्ध उत्पादों के लिए मिल्क फेडरेशन की मिलकीयत में कौन से सरोकार पलते होंगे। क्या हमारा ढांचा निरंतर चापलूस होता जा रहा है या मजबूरियां ही अब सुशासन की कसौटी हैं, जो सरकारों को चुनाव तक चलाने का इंतजाम है। प्रदेश में प्रशासनिक सरोकारों को रूटीन में जिंदा रखने के लिए यह जरूरी है कि काबिल अधिकारी स्वतंत्र व निष्पक्ष रहकर काम कर सकें। इसके लिए प्रशासनिक विकेंद्रीयकरण केवल इमारत में एक अधिकारी चिपका देना भर नहीं है, बल्कि इस एहसास को जागृत करना भी है। प्रायः ऐसा महसूस होने लगा है कि सरकारी दायित्व अब कमोबेश हर अधिकारी की एक सीमित समय अवधि है और उसे केवल निभाना भर है, इसलिए दफ्तरी माहौल में ‘नौकरी’ और दायित्व के बीच अंतर पैदा हो गया। शहरों में ट्रैफिक प्लान जैसे कार्यों में भी प्रशासनिक सरोकारों की चूलें हिल चुकी हैं, जबकि ‘साहब’ की संज्ञा केवल एक उपस्थिति है। हर कोई राजनीतिक अभिलाषाओं की फेहरिस्त में निरंतर कमजोर हो रहा है, लेकिन प्रशासनिक सरोकारों का हारना व्यवस्था की सबसे बड़ी व्यथा है।

 

 

You might also like