सोशल मीडिया की गंदगी

— पूजा, जवाली

सोशल मीडिया का योगदान हमारे समाज में बहुत है और इसी की वजह से हमें अपने विचारों, सभ्यता, संस्कृति से विश्व को वाकिफ करवाने में सहायता मिली है। कुछ समय से चुनावों की गहमागहमी ने भी जनता में मानो द्वेष और ईर्ष्या के बीज बो दिए हैं। हम अपनी पसंदीदा पार्टियों की वाहवाही सुनने और दूसरी पार्टियों की खिल्ली उड़ाने का भी बहुत हुनर रखते हैं। किसी एक पार्टी को आसमान की ऊंचाइयों पर देखने के लिए दूसरी को नीचा दिखाने के चलते मानवता, अच्छाई और अपनी सभ्यता-संस्कृति को भी भूल चुके हैं। आक्रोश की इस जंग में अगर कहीं गलती से आपने किसी को अपनी संस्कृति की अंतरात्मा, उसके अस्तित्व को समझाने या उसके अनुरूप व्यवहार करने की बात कर दी, तो आपको भी किसी पार्टी का विरोधी और पक्षधर समझा जाने लगेगा। हम अपनी सभ्यता, संस्कृति की बातें तो बहुत करते हैं, परंतु वही संस्कृति आज न तो हमारे आचरण में नजर आती है और न ही यह हमारे अलफाजों में कहीं जगह बना कर रख पाई है। इसी से पता चलता है कि जिस सभ्यता, संस्कृति को दूसरों तक पहुंचाने के ख्वाब हम देखते हैं, उसकी वास्तविकता से हम स्वयं ही अनभिज्ञ हैं। अगर हमारी संस्कृति और संस्कार हमें ही सभ्य नहीं बना पा रहे हैं, तो इनके प्रभाव और अहमियत का साक्ष्य हम कैसे पेश कर सकते हैं। ध्यान रखना होगा कि सोशल मीडिया अगर सही और अच्छाई फैलाने का जरिया बनता है, तो इसकी भूमिका उन्हीं प्राचीनकाल के साधु-संतों और महात्माओं की तरह होगी, जो सभ्यता, संस्कृति के प्रचार-प्रसार का जरिया बने थे अन्यथा घृणा, द्वेष फैलाकर हम कौन से ब्रिटिशर्स से कम होंगे, जिन्होंने न सिर्फ लोगों को बांटा था, बल्कि देश को अपनी ही जनता के लहू से रंग दिया था।

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