स्वास्थ्य आयोग को भंग करने की तैयारी

शिमला – प्रदेश की जयराम सरकार स्वास्थ्य आयोग को भंग करने की तैयारी कर चुकी है। पूर्व की वीरभद्र सिंह सरकार ने वर्ष 2015 में स्वास्थ्य के क्षेत्र को मजबूत करने के लिए स्वास्थ्य आयोग का गठन किया था, लेकिन हैरानी की बात है कि उस कार्यकाल में भी मात्र एक ही बैठक हुई। यानी कुल मिला कर चार साल में मात्र एक ही बैठक हो पाई। दिसंबर, 2017 में जयराम सरकार बनी, तो स्वास्थ्य आयोग पर कोई ध्यान नहीं दिया गया। कारण यह बताते हैं कि प्रदेश सरकार अपने आधार पर सब कुछ कर रही है, तो आयोग की आश्यवकता क्यों हैं? वर्तमान सरकार की मानें तो पूर्व की कांग्रेस सरकार ने बिना किसी बजट और आनन-फानन में स्वास्थ्य आयोग का गठन किया था। अब तक जयराम सरकार का करीब 16 महीने का कार्यकाल भी पूरा हो चुका है, लेकिन आयोग का संचालन करने में रुचि नहीं दिखा रही है। बताया गया कि आयोग की सिफारिशों को लागू करने के लिए राज्य सरकार को केंद्र सरकार से भी वित्तीय मदद मांगनी पड़ेगी। हिमाचल स्वास्थ्य आयोग ने अक्तूबर, 2015 में अपनी पहली रिपोर्ट राज्य सरकार को सौंपी थी। पूर्व सरकार ने निःशुल्क दवाइओं की संख्या बढ़ाकर और कई तरह के टेस्ट फ्री कर इसकी शुरुआत की थी, लेकिन बजट न होने के चलते हैल्थ कमीशन के सभी सुझावों को लागू ही नहीं कर पा रहा था। स्वास्थ्य आयोग की पहली रिपोर्ट के मुताबिक पीएचसीए, सीएचसी से लेकर जिला और जोनल अस्पतालों को आईपीएचएस यानी इंडियन पब्लिक हैल्थ स्टैंडर्ड के मानकों पर खरा नहीं उतरते। इनमें सुधार की सिफारिश की थी। इसके अलावा प्रदेश के सौ अस्पतालों को स्टार प्राथमिक केंद्र बनाने की सिफारिश कर डाक्टरों की कमी को दूर करने के निर्देश दिए थे। राज्य के सीएचसी, पीएचसी में सुविधाएं मुहैया करवाना। प्रदेश में विशेषज्ञ चिकित्सकों की तैनाती करना। ट्रॉमा सेंटर विकसित करना, शिमला में सुविधाओें से लैस ट्रॉमा सेंटर खोलने की सिफारिश की थी। आयोग ने सिरमौर और कांगड़ा में स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार करने को कहा था, मगर सरकार के पास इतना अधिक बजट नहीं है कि वह आयोग का संचालन कर सके।

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