हर बीमारी का इलाज, लोहे की गरम सलाख

मध्य प्रदेश के बेतुल जिला मुख्यालय से 50 किमी दूर और नेशनल हाई-वे 47ए पर स्थित चिखरी पंचायत का गुररिया गांव बेहद पिछड़ा है। इस गांव में करीब 150 आदिवासी परिवार रहते हैं। देखने में यह किसी किताबी गांव सा लगता है। बच्चे खेलते रहते हैं, कभी पंछियों के पीछे भागते हैं। घरों की छतों पर महुआ सूखता है और बैलगाड़ी एक किमी दूर स्थित कुएं से धीरे-धीरे पानी लाकर गांव में देती है। पहाड़ों के बीच बसा गांव सुंदर भले ही लगता हो, यह आज भी इतना पिछड़ा हुआ है कि देखकर होश उड़ सकते हैं। यहां छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी बीमारी का एक ही इलाज है- दमाह। जब भी किसी को चाहे कोई भी बीमारी हो, चाहे नवजात हो या बुजुर्ग लोहे की सरिया को गरम करके परेशानी वाली जगह पर लगा दिया जाता है। बच्चे रोते हैं, चिल्लाते हैं, लेकिन लोगों को लगता है कि ऐसा उनकी भलाई के लिए किया जा रहा है। गांव के लगभग हर आदमी, औरत और बच्चे का इलाज दमाह से किया जा चुका है। इसके पीछे दो वजहें हैं। एक तो यह कि गांववालों को विश्वास है कि यह हर समस्या का समाधान है। इसके अलावा एक बड़ा कारण यह भी है कि सबसे नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र 20 किमी दूर स्थित है और अस्पताल बेतुल में है। आशा कार्यकर्ता सुशीला सेलुकर बताती हैं, हमने गांववालों से दमाह न करने के लिए कहा है, लेकिन उनका मानना है कि यही उनकी बीमारी का इलाज है। हमें अस्पतालों की जरूरत है। दमाह एक पुरानी आदिवासी परंपरा है और इसे घरों पर भी किया जाता है। आदिवासी गांवों में जागरूकता जरूरी होती है। 5000 से ज्यादा आबादी वाले गांवों में स्वास्थ्य केंद्र होते हैं। हर गांव में आशा कार्यकर्ताएं होती हैं और मेडिकल एमर्जेंसी में उनसे संपर्क किया जा सकता है। 

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