हिमाचली हिस्से की जीत-1

जादुई समीकरणों के घरौंदे में हिमाचल ने चुनाव को जिस अदा से स्वीकार किया है, उसमें समाज के कंधों पर परिवर्तन का ऐलान चढ़ा है। चुनावी जीत की खुशियों में बढ़ी हिमाचल सरकार की जिम्मेदारी का अब एक नया दौर, प्रदेश से मुखातिब है। बेशक जयराम सरकार को ऐसी जीत का वजीफा मिलेगा और मजबूत केंद्र से पाने का अवसर भी प्राप्त होगा, लेकिन दो विधायकों को सांसद बनाने की पेशकश में अब उपचुनाव की घंटियां बजेंगी। जाहिर है जनता ने मोदी को इसलिए भी चुना कि उनके सिर पर हिमाचली टोपी के मार्फत संवदेना आत्मीयता से जुड़ी रही। हिमाचल आगमन पर प्रधानमंत्री ने यह कोशिश हमेशा की कि संवाद संप्रेषण में नजदीकी रहे और उनके हिस्से का हिमाचल फले फूले। पिछले चुनाव में हिमाचल ने उन्हें अंगीकार किया, इस बार प्यार किया है और इसलिए भी कि सत्तर फीसदी मतों से अगर प्रधानमंत्री को जनता ने तौला है, तो उम्मीदें भी पहाड़ पर हैं। राष्ट्रीय मसले हिमाचल को छूते हैं, लेकिन प्रदेश के मर्म पर सौहार्द का हाथ चाहिए। राज्य की महत्त्वाकांक्षा पिछले चुनाव से ही दौड़ रही है, तो अब सीधे मोदी से रू-ब-रू होने का असर चाहिए। यानी फिर हिमाचली अधिकार किसी गोताखोर की तरह पौंग-गोबिंदसागर के गर्भ से अपने दर्द का हिसाब ले आएंगे, तो विस्थापन के बिछुड़ों को जोड़ने की पहल चाहिए। चाहिए तो जीने का हक भी और हासिल करने के लिए इस पहाड़ पर तमन्ना बसती है। यह तब-तब पूरी हुई, जब-जब किसी प्रधानमंत्री ने हिमाचल को गले लगाया और यह हर बार हुआ और कमोबेश देश के हर प्रधानमंत्री ने प्रदेश को इस हिसाब से दिया। पूर्ण राज्यत्व की डगर हो, बांध परियोजनाओं का असर हो या विशेष राज्य का दर्जा हो, हिमाचल ने केंद्र से अभिभावक का प्रश्रय पाया। खासतौर पर अटल बिहारी वाजपेयी के युग में औद्योगिक पैकेज, ग्रामीण सड़क योजनाएं तथा रोहतांग सुरंग के रास्ते उनकी नजदीकी का सफर देखा जा सकता है। मोदी सरकार के पहले चरण में हिमाचल को उदारता से देखा भला गया हो, लेकिन बीच में वीरभद्र सरकार से जुड़ी सियासत ने हाथ खींच लिए। अब प्रदेश में जयराम सरकार के साढ़े तीन साल की चमक और धमक का सवाल है, तो प्रदर्शन की बाट जोह रहे हिमाचल को मोदी सरकार के रुतबे का इंतजार है। खासतौर पर कनेक्टिविटी के लिहाज से पूर्व घोषित नेशनल हाई-वे फोरलेन सड़कों को अमलीजामा पहनाने, हवाई अड्डों के विस्तार तथा नई परियोजनाओं के श्रीगणेश का इंतजार रहेगा। मोदी के फैसलों में स्मार्ट सिटी परियोजनाओं को कितना बल मिलता है या ‘उड़ान’ के तहत अगले चरण में हिमाचल कितना जुड़ता है, देखना बाकी है। सारे देश में मोदी लहर अगर दशकों से हिमाचल के मुद्दों को समझ कर केंद्र से इत्तलाह कर दे, तो हो सकता है कि पड़ोसी राज्यों से झगड़े मिट जाएं या जलाधिकारों को लेकर कोई नीति बन जाए। हिमाचल का दर्द केवल एक राज्य का नहीं, बल्कि समस्त पर्वतीय राज्यों को समझने तथा इनकी मौलिकता में सीधे केंद्र से आर्थिक मदद की दरकार है। करीब चार दर्जन सांसद हिमालय की पट्टी या पर्वतीय आंचल से दिल्ली पहुंचते हैं, तो सरकार में इनकी महत्त्वाकांक्षा को प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। ‘दिव्य हिमाचल’ पिछले दो दशकों से केंद्र में अलग से पर्वतीय विकास मंत्रालय तथा इसी के परिप्रेक्ष्य में प्राधिकरण के गठन की मांग करता रहा है। यह पर्वतीय आर्थिकी, पर्यावरणीय संतुलन, जल संसाधनों के संरक्षण, जैविक विविधता, सांस्कृतिक संरक्षण तथा विकास के मानकों व नवाचार के आधार पर अति आवश्यक है कि मोदी सरकार में अलग से पर्वतीय विकास मंत्रालय का गठन हो। कुछ इसी तरह पर्वतीय अंचल की अपनी दुरुहता के समक्ष राष्ट्रीय प्राथमिकताओं का उल्लेख इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय सीमाओं पर खड़ी भौगोलिक परिस्थितियां आंतरिक सुरक्षा से इस भू-खंड को अलग से पेश करती हैं। चीन की भारत से सटी लंबी सीमा एक तरह से भारत के पर्वतीय आंचल की सामाजिक-सांस्कृतिक व आर्थिक पड़ताल भी है। ऐसे में आंतरिक और बाह्य सुरक्षा के हर कदम की शिनाख्त इन पर्वतीय राज्यों में होगी। सीमाई इलाकों में सदाबहार सड़क परियोजनाओं के अलावा लेह रेल परियोजना का श्रीगणेश होता है, तो राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ-साथ पर्यटन को नई मंजिलें मिलेंगी।

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