हिमाचली हिस्से की जीत-2

मोदी करिश्मे का एक सामाजिक पक्ष भी है और जो हिमाचल जैसे राज्य की जनता को सपने देखने का अवसर देता है। यह इसलिए भी क्योंकि यह प्रदेश सबसे शांतिप्रिय, सुशासित और भारत के संघीय ढांचे की खूबसूरत तस्वीर पेश करता है। देश के लिए हिमाचल की हाजिरी जिस तरह सरहदों पर लगी है, उसका वर्णन वे तमाम शौर्य तमगे करते हैं, जो प्रदेश की छाती पर चस्पां है, लेकिन कहीं वोट की राजनीति ने राज्य की अहमियत को केवल जनसंख्या मान लिया। इसीलिए सैनिक भर्ती में कोटा तथा हिमाचल या हिमालय रेजिमेंट के गठन पर गतिरोध खड़ा होता है। देश के लिए पहला परमवीर चक्र हासिल करने वाले राज्य को इससे बड़ा सम्मान और क्या होगा कि हिमाचल की अस्मिता के साथ अलग से रेजिमेंट का नाम भी जुड़े। इसी तरह सैन्य प्रतिष्ठानों की स्थापना के लिए हिमाचल की अर्जी अब तक अनसुनी कर दी गई। केंद्र से हिमाचल की राजनीतिक विरासत फिर जुड़ रही है, तो एक अदद ‘रेल पैकेज’ के नाम पर प्रदेश पर केंद्र की मेहरबानी का असर और स्पष्ट होगा या कई राष्ट्रीय संस्थानों व उपक्रमों की स्थापना से ‘न्याय’ मिलेगा। हिमाचल में जय-विजय उद्घोष केवल मोदी के लिए नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष या परोक्ष में यह मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर को भी मजबूत कर रहा है। कांग्रेस के लिए संदेशों की पोटली खुल रही है, तो संगठन से हर नेता तक तमाम सवाल हैं। आज की तारीख में तो वीरभद्र सिंह भी बड़े नेता दिखाई नहीं देते, तो पार्टी अध्यक्ष कुलदीप राठौर से नेता प्रतिपक्ष मुकेश अग्निहोत्री तक नेतृत्व पर छींटे दिखाई देते हैं। भाजपा बनाम कांग्रेस के बीच मतों का अंतर अगर  कोई टिप्पणी है, तो हर नेता को मनन करना होगा। यह संकेत कांग्रेस की घटती स्वीकार्यता का भी है, जो आगामी उपचुनावों तक संघर्ष की नई बिसात बिछा चुका है। धर्मशाला व पच्छाद विधानसभा क्षेत्रों के उपचुनाव वास्तव में जनता का मूड बताएंगे और यहां राज्य के नेतृत्व की समीक्षा भी होगी। राजनीति के घायल परिंदों की तरह सुखराम तथा वीरभद्र सिंह के तिलिस्म टूटे हैं और उन्हें सेवानिवृत्त करने की सूचना दी है। चुनाव परिणामों ने शांता कुमार व प्रेम कुमार धूमल के निजी खातों में राजनीतिक आशा डाली है, तो यह मानना पड़ेगा कि पार्टी अपनी इस अमानत के पक्ष में सत्ता का सौहार्द कैसे भेंट करती है। क्या किसी वरिष्ठ नेता को राज्यपाल जैसे पद, संगठनात्मक भूमिका में कोई दायित्व मिलता है या युवा ऊर्जा के आगे ये भी रिटायर हो जाएंगे। भले ही केंद्रीय मंत्री जगत प्रकाश नड्डा अपने प्रदेश की चुनावी रणनीति से दूर रहे, लेकिन चुनावी परिणामों में उनका राष्ट्रीय योगदान सही सांचे में निरूपित होता है। कयास तो उन्हें संगठन में उच्च पद पर देख रहे हैं और अगर ऐसा हुआ, तो हिमाचल से केंद्र में नया मंत्री कौन होगा। हमीरपुर संसदीय क्षेत्र की जनसभा में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह जिस तरह अनुराग ठाकुर को ‘बड़ा नेता’ बनाने का वादा कर चुके हैं, अब उस कौल के यथार्थ में आने का इंतजार है। अपनी चौथी पारी खेल रहे अनुराग ठाकुर को केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह मिलती है, तो हिमाचल की युवा आकांक्षाओं का मार्ग प्रशस्त होगा। जीत के आगोश में हिमाचल सरकार की क्षमता और संभावना में आशातीत बढ़ोतरी हुई है, लिहाजा अब वक्त कार्रवाइयों में तेजी और फैसलों में उपलब्धियां गिनना चाहता है। हिमाचल की जो परियोजनाएं केंद्र में लंबित हैं, वित्तीय अनुमतियां रुकी हैं या वनापत्तियों पर सहमति चाहिए, प्रदेश सरकार को तेजी से काम करना है। जीत के बाद महत्त्वाकांक्षी इन्वेस्टर मीट का संचालन व इसकी फेहरिस्त में भविष्य की वचनबद्धता अगर पूरी होती है, तो यह जयराम सरकार का असली रूप होगा। बेशक जनमंच का आगाज करके सरकार ने जनता तक अपनी पहुंच का प्रदर्शन किया, लेकिन अब उम्मीदों को सार्थक तथा यथार्थ में बदलने की परीक्षा है। करीब सत्तर फीसदी मतों को हासिल करके केंद्र व प्रदेश सरकारों के सामने यह चुनौती बढ़ जाती है कि जनादेश के ऐसे विश्वास को किस तरह धरती पर सही साबित करें। जनता ने सारे भेद मिटाकर भाजपा सरकारों को लगातार समर्थन दिया है, तो हिमाचल की जनता इसे मूलधन की तरह देखेगी। लोकसभा चुनाव में प्रदेश की अड़सठ की अड़सठ विधानसभाओं ने भाजपा के पक्ष में मतदान करके हिमाचल सरकार के पैमाने बदल दिए हैं और इस तरह विकास की प्राथमिकताएं अब विपक्ष में किसी विधायक की परिपाटी से अलहदा मोदी की सरपरस्ती में देखी जाएंगी।

– क्रमशः

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