हिमाचली हिस्से की जीत-3

जो देश में, क्या वही हिमाचल में भी हुआ या इसके अलावा भी राजनीति ने प्रदेश को अपना वृत्तांत सुनाया है। कांग्रेस के अपने पिंजरे और पिंजरों से संचालित सियासत का अंत न हुआ, तो आगामी सफर की कहानी पुनः दो उपचुनावों से लिख दी जाएगी। देश की तर्ज पर लोकसभा चुनाव हिमाचल में भी कांग्रेस को जमींदोज कर रहे हैं, लेकिन यहां परिस्थितियां अंततः प्रदेश के मसलों को आगे रखती हैं। छह माह की अवधि में उपचुनाव का गणित वास्तव में दो सरकारों की समीक्षा सरीखे होंगे। इससे पहले यह समझना भी जरूरी होगा कि हिमाचल की राजनीति में लोकसभा चुनाव नतीजों से संदेश और समीकरण कैसे बदले हैं। जाहिर तौर पर जो टिप्पणियां होंगी, उनकी लाभप्रद स्थिति से प्रदेश की सत्ता और खास तौर पर मुख्यमंत्री लाभान्वित होंगे, फिर भी चार लोकसभा क्षेत्रों के नेतृत्व पर कुछ आशाएं – कुछ प्रश्न साफ हैं। जिस तरह मंडी व शिमला संसदीय सीटों के चुनाव परिणाम सीधे तौर पर वीरभद्र सिंह व सुखराम की राजनीति को एक तरह से अलविदा कर रहे हैं, वहीं जयराम ठाकुर का युग प्रतिबिंबित हो रहा है। हमीरपुर संसदीय क्षेत्र की अपनी जद्दोजहद में प्रत्यक्ष अनुराग ठाकुर व परोक्ष में प्रेम कुमार धूमल की पृष्ठभूमि अपनी ताकत का एहसास कराती है, तो कांगड़ा में शांता कुमार के उत्तराधिकार में रेखांकित परिणाम जो खोज रहा है, उसकी परिणति धर्मशाला विधानसभा उपचुनाव के जरिए होगी। यह उपचुनाव अपने परिदृश्य के साथ कांगड़ा का राजनीतिक हक टटोलेगा, तो उन परंपराओं का अनुशीलन भी ज्ञापित करेगा जो वीरभद्र सिंह ने धीरे-धीरे इस जिला को सौंपी थी। फिलहाल कांगड़ा अपने लिए कद्दावर नेता ढूंढ रहा है, तो इसकी कसौटी अब किशन कपूर की ताजपोशी को भी देख रही है। बतौर सांसद उनकी भूमिका या मोदी सरकार में तरक्की की पहचान कितना बताएगी, जबकि यह भी देखा जाएगा कि प्रदर्शन की उनकी पृष्ठभूमि अपने कितने अवरोधक  हटा पाती है। इससे ही जुड़ा है धर्मशाला का उपचुनाव और यहां से सही उम्मीदवार पर सहमति बनाने के लिए उनकी भूमिका भी देखी जाएगी। यह इसलिए भी कि कांग्रेस के पूर्व मंत्री सुधीर शर्मा की हार ने विधानसभा क्षेत्र की महत्त्वाकांक्षा को इस दौरान परास्त नहीं किया, बल्कि हताश भी किया है। स्मार्ट सिटी, नगर निगम की स्वायत्तता, आईटी पार्क, दूसरी राजधानी का दर्जा, हाई कोर्ट खंडपीठ की स्थापना तथा कांगड़ा एयरपोर्ट के विस्तार जैसे मसले उपचुनाव में सरकार की परीक्षा लेंगे। बेशक इस बीच जयराम सरकार इन्वेस्टर मीट के बहाने धर्मशाला को अपना नाम व मुकाम देगी, फिर भी भाजपा के स्थानीय तथा जिला नेतृत्व के लिए मोदी जीत और उपचुनाव की रीत में क्षमता, विजन व विमर्श की पड़ताल होगी। दूसरी ओर कांगड़ा की राजनीति के कांग्रेसी छोर पर दो ध्रुव रहे सुधीर शर्मा व जीएस बाली के बीच संतुलन नहीं बनता, तो पार्टी के लिए मुश्किलें और विनाशकारी बनेंगी। वीरभद्र सिंह के अस्त होते युग की सबसे बड़ी समीक्षा उपचुनावों में खास तौर पर कांगड़ा में फिर से होगी और अगर कांग्रेस को अपने अस्तित्व की जंग लड़नी है तो पार्टी का वर्तमान ढर्रा काम नहीं आएगा। जाहिर है जिस तरह संगठन को सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने तैयार किया था, उसे ऐन लोकसभा चुनाव के वक्त खुर्द-बुर्द किया गया तो कांग्रेसी सतह के कांटे सामने हैं। उपचुनाव के जरिए शक्ति और समर्पण के बीच हिमाचल कांग्रेस क्या चुनती है, इसका भी फैसला होगा। ऐसे में हिमाचल की राजनीतिक परंपराएं धर्मशाला और पच्छाद के जरिए नई चुनौती के साथ मुआयना करेंगी।

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