हिमाचल का भाषाई वजूद

तहजीब का जिक्र जुबान करती है, तो कायदे से हिमाचल की भाषाई स्निग्धता अपने आंगन में किसे कबूल करे। पहले बिना किसी मांग और संयोग के हिमाचल को अगर हिंदी भाषाई राज्य घोषित किया गया, तो अब संस्कृत के आभामंडल में प्रदेश को बोलना सिखाया जा रहा है। कोई तो जिद काम कर रही है, वरना संस्कृत को दूसरी राजभाषा घोषित करने से पूर्व उन बोलियों पर काम होता, जिन्हें मिला भर देने से हिमाचल की भाषाई अस्मिता परवान चढ़ती। खैर राजभाषा के कक्ष में अब संस्कृत का हुस्न आमंत्रण दे रहा है और अगर आप चाहें तो पत्राचार के लिए सरकार के कान इसे भी सुनेंगे। पहले हिंदी के आवेदनों में आम जनता के कितने विषय राज्य सचिवालय को समझ आए, यह अपने आप में बड़ी पड़ताल है और इसका मूल्यांकन ही साबित करेगा कि हम प्रवृत्ति से कितना नजदीक हैं हिंदी के। क्या हम हिंदी के काबिल बने या यह प्रदेश हिंदीमय हो गया। हिंदी राज्यों की पांत में एक कलगी जरूर लगी और इसका श्रेय शांता कुमार की तत्कालीन सरकार ले सकती है, लेकिन इससे हिमाचल का भाषाई वजूद तो सुदृढ़ नहीं हुआ। आज हिमाचल के हिंदी लेखक या यहां से लिखे गए हिंदी साहित्य को बड़े प्रदेशों की लाबी से मुकाबला करना पड़ता है या यूं कहें कि हमारी कोशिशें ही तोहमतें बन गईं। पड़ोसी गैर हिंदी जम्मू-कश्मीर, पंजाब या अन्य ऐसे राज्यों से मजबूत होता हिंदी का रिश्ता, हिमाचल से भिन्न हो गया। अपनी जुबान के संघर्ष के बजाय हिंदी राज्यों की पांत में फिसलना कहीं अधिक असमानता का द्योतक इसलिए भी रहा, क्योंकि हमें पूर्ण हिंदी राज्य के रूप में परखा गया, जबकि हकीकत इससे कहीं विपरीत है। गैर हिंदी राज्यों के सम्मानित अध्याय हिमाचल से कहीं बेहतर इसलिए हो गए, क्योंकि वहां राष्ट्रीय फलक की आजादी बढ़ गई और मूल्यांकन इस दृष्टि से हुआ, ताकि इन राज्यों की बोलियों और क्षेत्रीय भाषाओं को बराबरी का दर्जा मिले। हिमाचल भले ही हिंदी राज्य हो गया, लेकिन इस पदक ने प्रदेश की बोलियों की समृद्ध परंपरा, लोक संस्कृति की आभा से एक संपूर्ण हिमाचली भाषा के आंदोलन को कुंद कर दिया। अब यहां का लेखक हिंदी में रचना को सुसज्जित करके राष्ट्रीय मूल्यांकन का ग्राहक बन गया, जबकि हिमाचल का प्रथम अधिकार लोक मूल्यों व संवेदना से ओतप्रोत बोलियों को भाषा के स्तर पर परिमार्जित करने से हासिल होगा। हम हिंदी राज्य की कूक में यह भूल गए कि संविधान की आठवीं सूची में हिमाचली भाषा का होना अब हमसे छिटक गया है। जब समाज हिंदी हो गया, तो पहाड़ी रहा कहां और अब तो संस्कृत भाषा के आलेप में हमारे माथे पर विशुद्ध सांस्कृतिक उजास चिन्हित हो गई। कल एक और संस्थान जन्म लेगा और हमारे राज्य के संसाधन संस्कृत विश्वविद्यालय की स्थापना में गौरवान्वित होंगे। दूसरी ओर इससे पहले हर मंदिर परिसर की कमाई से खड़े संस्कृत महाविद्यालय, राजकीय संस्कृत महाविद्यालय तथा गरली में राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान होने के बावजूद हमने क्या सीखा-क्या पाया, इसका विश्लेषण कौन करेगा। शिमला तथा केंद्रीय विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग की रिक्त पड़ी सीटों का अमूल्य योगदान कैसे तय होगा। आश्चर्य यह कि अदृश्य कारणों, राजनीति विचारधारा की पृष्ठभूमि तथा परंपरावादी होने के सबूत में अगर राज्य के गले में दूसरी राजभाषा बतौर संस्कृत लटकाई जा रही है, तो इसके औचित्य पर कोई बहस तो करवाते। हिमाचल में हिंदी से ज्यादा और संस्कृत से सौ फीसदी से भी अधिक पंजाबी, उर्दू व कुछ अन्य भाषाओं के प्रति स्वाभाविक रुझान है। ऐसे में पंजाबी व उर्दू को अछूत बनाकर संस्कृत का महिमामंडन शासकीय उपलब्धि हो सकता है, लेकिन सामाजिक-सांस्कृतिक विरासत से निकला हुआ आग्रह नहीं। पहले कला, भाषा और संस्कृति विभाग राष्ट्रीयकृत मंदिरों में पूजा-अर्चना की पद्धति तथा मंत्रोच्चारण की वर्तमान शैली को ठेठ संस्कृत में पारंगत करे, तब कहीं ऐसी उपलब्धियों की प्रासंगिकता समाज के दिलोदिमाग में अंकित होगी। कड़वा सच यह है कि हिमाचल का दफ्तरी माहौल या प्रशासनिक संवाद आज भी अंगे्रजी में अर्जी मांगता है, तो कल संस्कृत में लिखने का गुनाह कौन करेगा और फिर ऐसे मंसूबों का आर्थिक बोझ शोभा तो कतई नहीं देता।

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