हिमाचल की बौद्धिक भूमिका

हिमाचल के बौद्धिक उन्नयन में तर्कशील प्रवृत्ति के कारण सियासत हमेशा कठघरे में रहती है, लेकिन सामाजिक आचरण ने नेताओं को अपनी खिड़की से नहीं देखा। इसलिए राजनीति जहां है, वहां समाज नहीं है और जो सामाजिक परिदृश्य में दृढ़ता से होना चाहिए, वहां सियासत विद्यमान रहती है। लोकसभा चुनाव के वर्तमान परिदृश्य में, मध्यमवर्गीय चतुराई का आलेप लगाकर, जो प्रचार हुआ है, उसमें मुद्दों की कढ़ाई ठंडी पड़ी है। हम विरोधी हो सकते हैं, लेकिन क्रांतिकारी नहीं। चुनाव बहिष्कार की चंद धमकियों के बीच हिमाचल के अपने मुद्दे-अपने अधिकार शांत हैं। बिना हिसाब-किताब किए नेताओं की पटरी बदलने में माहिर हिमाचल अपनी सियासी मंजिल क्यों नहीं जान पाया। आश्चर्य यह कि हिमाचल के बुद्धिजीवियों के प्रिय विषय सियासी चर्चाओं को समाहित करके भी कोई सार्थक परिणाम नहीं ला पाए तो इसे क्या कहेंगे। दरअसल नैतिक कर्त्तव्यों से पीछे मुड़ रहा हिमाचली समाज इतना खुदगर्ज हो गया है कि अपने स्वार्थ के लिए उसे अब राज्य के प्रति कोई भूमिका नजर नहीं आती। हैरानी यह कि हिमाचल का अत्यधिक बुद्धिजीवी समाज विभिन्न विषयों पर राज्य से सवाल पूछने की जुर्रत नहीं करता, लिहाजा ऐसी कोई परंपरा नहीं बन पाई, जिससे जनता अपने अनुभव व नजरिए से अतिरिक्त ज्ञान की पूंजी दे पाए। देखने में हिमाचल की दो तिहाई आबादी बौद्धिक परिवेश का सिर ऊंचा करती है, लेकिन अपनी मौजूदगी को दर्ज कराने की जिरह नहीं करती। आलोचनात्मक समाज ही राजनीति की दुरुस्ती कर सकता या सरकारों को जवाबदेह बनाने में योगदान कर सकता है। बेशक हिमाचल में भी दक्षिण और वामपंथी धु्रवों की तीव्रता में विचारों का संघर्ष छात्र जीवन तक विद्यमान है, लेकिन प्रदेश के प्रति विजन और विमर्श आंदोलित नहीं हुआ। भारतीय मजदूर संघ ने कुछ हद तक परिवहन क्षेत्र में अपनी पैठ बनाई, तो वामपंथी संघर्ष की गाथा में किसान-बागबान से विद्युत परियोजनाओं तक के मुहानों की लाली समझी जा सकती है। सामाजिक मुद्दों के नेतृत्व में कलाकार और लेखक की भूमिका हिमाचली आवाम के नखरे नहीं उठा पाई और यह आश्चर्यजनक सत्य है। लेखक समुदाय प्रेस विज्ञप्ति लिखता रहा या मीडिया के कंधे पर सवार होकर वाक्य चुनता रहा, लेकिन प्रत्यक्ष आह्वान से दूर रहकर यह वर्ग वास्तव में बौद्धिक भूमिका निभाने से कतराता रहा। इसकी बड़ी वजह यह भी रही कि हिमाचली लेखन पर सरकारी पगार का ऋण सदैव रहा। सरकारी बुद्धिजीवी होना लेखन की समृद्धि तो करता रहा, लेकिन सीधे राज्य के खिलाफ बौद्धिक लड़ाई लड़ने का माद्दा पैदा नहीं कर सका। कुछ इसी तरह हर बुद्धिजीवी अपनी पगार की कतार में खडे़ रहकर आत्मा की पुकार नहीं सुन पाया या यह भी कि हर घर से सरकारी कर्मचारी होने की वजह से सीधे कहने की हिम्मत यह वर्ग नहीं कर पाया। यही वजह है कि नागरिक समाज आज तक हिमाचल की सत्ता को निर्देशित नहीं कर पाया, भले ही सरकारों की पलटा-पलटी तसल्ली से होती रही। बुद्धिजीवी वर्ग को या तो सत्ता से आर्थिक फायदे चुनते देखा गया या सरकारी नौकरी से सेवानिवृत्त होकर भी पेंशन के फायदे मापने तक यह वर्ग सीमित रहा। इसीलिए चुनाव दर चुनाव मुद्दाविहीन हो रहे हैं और सत्ता जागरूक समाज के सामने अपनी राजनीतिक प्राथमिकताएं पूरी करते हुए बौद्धिक राज्य की मूल भावना को बड़ी आसानी से नजरअंदाज कर देती है। हिमाचल की वास्तविक आर्थिकी में वैचारिक ऊर्जा न होने के कारण जो मध्यमवर्गीय शैली उभरी है, वह सरकारी लाभ में पलते बुद्धिजीवी बने रहने की पहली से अंतिम शर्त बन गई। भविष्य में एक अलग संघर्ष खड़ा हो रहा है और आज की युवा पीढ़ी जिस तरह करियर को निजी क्षेत्र की प्रतिस्पर्धा में परिमार्जित कर रही है, तो उसके बौद्धिक फलक पर राजनीति को बदलाव करना ही पड़ेगा। यह वर्ग पहले ही हिमाचल की शिक्षा प्रणाली को ठुकरा चुका है और उस बिसात को भी, जिसके ऊपर नौकरियों की सौगात के नाम पर युवाओं को भ्रमित किया जा रहा है।

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