1998 से दोहरे चुनाव का ट्रेंड बंद

शिमला —हिमाचल में कभी लोकसभा चुनाव  के लिए दो अलग-अलग समय में मतदान हुआ करता था। प्रदेश में कई स्नो बाउंड एरिया हैं, जहां के मौसम को देखकर चुनाव आयोग अलग से मतदान की तारीखें तय करता था। उस समय  राजनीतिक दलों को पहले से यह अंदाजा होता था कि जनजातीय क्षेत्रों के लिए किस ओर चलेंगे क्योंकि तब तक चुनाव के नतीजे घोषित हो जाते थे और जनजातीय क्षेत्रों में बाद में चुनाव होता था।  ऐसा विधानसभा के चुनाव में भी होता आया है। प्रदेश में वर्ष 1998 में स्नो बाउंड एरिया में अलग से मतदान की प्रक्रिया को बंद कर दिया गया। क्योंकि टेक्नोलॉजी का विस्तार हुआ और मौसम विभाग से पूरी जानकारी चुनाव आयोग को मिल जाती है, इसलिए चुनाव आयोग को प्रक्रिया बदलने में इससे मदद मिल गई। आज पहले ही यह पता होता है कि हिमाचल  के स्नो बाउंड एरिया में कब कैसा मौसम रहेगा। इसे ध्यान में रखते हुए ही यहां पर चुनाव की तारीखें तय होती हैं। इतिहास की बात करें तो प्रदेश के स्नो बाउंड एरिया में अलग से मतदान वर्ष 1967 से शुरू हुआ। इससे पहले वर्ष 1951-52, 1957 व 1962 में सभी क्षेत्रों में एक साथ ही चुनाव हुआ करते थे। इस प्रक्रिया में तब दिक्कत पेश आने के चलते व्यवस्था को बदला गया और वर्ष 1967, 1971, 1978, 1980, 1984, 1989, 1991, 1996 व 1998 तक फिर स्नो बाउंड एरिया में अलग से चुनाव की तारीखें तय होती रहीं। लोकसभा के साथ-साथ यहां विधानसभा चुनाव के लिए भी अलग से  चुनावों की तारीखें तय होती रहीं और 1998 में इस प्रक्रिया को बंद कर दिया गया। तब से लेकर आज तक लोकसभा व विधानसभा के चुनाव एक साथ होते हैं और नतीजे भी एक साथ आते हैं। हेलिकॉप्टर की ली जइन स्नो बाउंड एरिया में मतदान केंद्रों की स्थापना से लेकर कर्मचारियों व चुनाव सामग्री को भेजने व ईवीएम को लाने के लिए हेलिकॉप्टर का इस्तेमाल किया जाता है। इस दफा भी चुनाव आयोग ने एयरफोर्स से तीन हेलिकॉप्टर मांगें हैं, जिसकी इजाजत मिल गई है।

सत्तासीन दल को होता था फायदा

यहां पर किसी भी दल की सरकार बनने के बाद जनजातीय क्षेत्रों के चुनाव होते थे। तब यहां पर सत्ता में जो भी दल हो उसे ही वहां से भीसीटें मिलती थीं। दलों को पहले से मालूम रहता था कि वहां का रुझान क्या रहेगा, लेकिन आज ऐसा नहीं है। उस समय राजनीतिक परिदृष्य बदलने का खतरा भी रहता था।

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