अपने ही देश में हिंदी की दुर्गति क्यों?

हाल ही में दक्षिण भारतीय राज्यों के विरोध के कारण केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति के मसौदे से हिंदी की अनिवार्यता को खत्म कर दिया। अब संशोधित शिक्षा नीति के मसौदे में हिंदी की अनिवार्यता का कोई जिक्र नहीं है। केंद्र सरकार के इस फैसले ने एक बार फिर से इस सवाल को खड़ा कर दिया कि भला हिंदुस्तान में ही हिंदी की ऐसी दुर्गति क्यों? इस सिलसिले में हिंदी कथाकार मुकेश शर्मा ने हिंदी को भारत और विश्व मंच पर स्थापित करने के लिए प्रयत्नशील और भाषा के सवाल पर स्वामी दयानंद सरस्वती, डा. राम मनोहर लोहिया की परंपरा को आगे बढ़ाने वाले भारतीय भाषा सम्मेलन के अध्यक्ष एवं देश के जाने-माने हिंदी पत्रकार, विश्लेषक डा. वेदप्रताप वैदिक से बातचीत की। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश :

 

प्रश्न : हाल ही में केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति के मसौदे से हिंदी की अनिवार्यता को खत्म कर दिया है। इस पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है?

उत्तर : केंद्र सरकार ने दक्षिण भारतीय राज्यों में हिंदी को नकार कर 72 साल पुरानी नीति को ही दोहरा दिया है। सरकार में दम होना चाहिए। यदि सरकार कह दे कि देश में अंग्रेजी की अनिवार्यता नहीं होगी, भले ही इसके लिए कानून लाना पड़े। सरकार अपना कामकाज हिंदी भाषा में करे। तब नतीजा यह होगा कि लोग स्वतः हिंदी की ओर बढ़ेंगे। हिंदी की अनिवार्यता के लिए मैंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मोहन भागवत से बात की। पुराने समय में पं. दीनदयाल उपाध्याय व अटल बिहारी वाजपेयी से भी बात की। मैंने अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर अपना शोध ग्रंथ हिंदी में लिखा जिस कारण जेएनयू के स्कूल ऑफ  इंटरनेशनल स्टडीज ने मेरी छात्रवृत्ति रोक दी थी। तब 1966-67 में संसद में इस मुद्दे पर हंगामा हुआ और परिणामस्वरूप इंदिरा गांधी की पहल पर स्कूल के संविधान में संशोधन करना पड़ा और मुझे वापस लेना पड़ा।

प्रश्न : दक्षिण भारतीय राज्यों को हिंदी से भला क्या दिक्कत हो सकती है?

उत्तर : दरअसल हिंदी वाले पाखंड बहुत फैलाते हैं। अंग्रेजी की अनिवार्यता के कारण यहां भारत और इंडिया दो अघोषित देश बन गए हैं। जब दक्षिण वाले हिंदी सीखते हैं तो वे व्याकरण की दृष्टि से हमसे भी शुद्ध हिंदी बोलते हैं। यदि अंग्रेजी की अनिवार्यता को खत्म करके यह व्यवस्था बना दी जाए कि हिंदी वाले अहिंदी भाषा सीखें और अहिंदी वाले हिंदी भाषा सीखें तो स्वतः समाधान हो जाएगा।

प्रश्न : क्या हिंदी भाषा अपनाने वालों को ‘दूसरे दर्जे का नागरिक’ समझा जा रहा है?

उत्तर : यहां अंग्रेजी को रानी और हिंदी को नौकरानी बना रखा है। हम किसी विदेशी भाषा के विरुद्ध नहीं हैं, बल्कि इस बात के पैरोकार हैं कि उस विदेशी भाषा की अनिवार्यता नहीं होनी चाहिए। अमरीका, रूस, चीन, फ्रांस, ब्रिटेन जैसे वीटो पावर वाले देशों में भी किसी विदेशी भाषा की अनिवार्यता नहीं है, जबकि विश्व के 49 पूर्व गुलाम देशों में ऐसा ही है। यहां तो दवाई भी लेनी हो तो अंग्रेजी चाहिए। कांग्रेस के इस मजाक को भाजपा भी चुनौती नहीं दे पाई, जबकि उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव ने अंग्रेजी को अनिवार्य भाषा से हटाकर ऐच्छिक भाषा बना दिया था। इसी की जरूरत है।

प्रश्न : क्या हिंदी पढ़कर बड़ा वेतन लेने लायक करियर बनाया जा सकता है?

उत्तर : देखिए, आज अंग्रेजी भारत और इंडिया के बीच एक अदृश्य दीवार की तरह से है। जब बीच में से अंग्रेजी हट जाएगी तो हिंदी भाषा के माध्यम से ही एक अच्छा करियर बनाया जा सकेगा।

मोबाइल नंबर : 9810022312.

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