अपराध के लांछन

पर्यटन सीजन के भीतर चीखते बीहड़ में कहीं तो हिमाचल के पांव धंस रहे हैं। मनाली से सेक्स रैकेट की परतों में या डमटाल में चिट्टे की ओवरडोज का मातम आखिर साबित यही तो करता है कि अपराध के लांछन प्रदेश की चादर को दागदार कर रहे हैं। दोनों घटनाक्रमों को हम एक हद तक पुलिस पहरे में देख सकते हैं, लेकिन कहीं छिद्रों के भीतर अपराध की आवाजाही अब हिमाचल को इसी की चरागाह बना रही है। यानी हमारे उज्ज्वल इरादों के भीतर कहीं कालिख भी घर कर रही है। हम पहले भी कह चुके हैं कि अगर भीड़ और पर्यटन के बीच सही और गलत का चयन नहीं होगा, तो पहाड़ पर हर सीजन कचरे का अंबार खड़ा कर देगा। बेशक मनाली पुलिस ने सेक्स रैकेट को अनावृत्त करते हुए सख्त संदेश दिया है, लेकिन इस तरह की शिकायतों की गिनती बढ़ रही है। विडंबना यह कि पर्यटन अपने साथ रोमांच व मनोरंजन की जरूरतों का लेखा-जोखा भी है और जिस तरह पैसा कमाने की मर्यादा का उल्लंघन हो रहा है, स्थानीय पिटारे भी हर तरह के साथी बन रहे हैं। पर्यटन के भीतर झांककर न तो सामाजिक भूमिका और न ही इसकी सीमा को बचाने की पैरवी हो रही है, लिहाजा ऐसे मनहूस लम्हों के गवाह हमीं को बनना पड़ता है। आखिर यह कैसे संभव होगा कि पर्यटन के अलग-अलग प्रिज्म से प्रदेश की छवि निकलेगी और यह भी कैसे देखा जाएगा कि जिस राह पर्यटन की गंदगी बिछी हो, उसी से गुजर कर हाई एंड टूरिस्ट भी चला आएगा। कसोल की बदनामी के साथ खड़ा पर्यटन बेशक व्यापारिक उत्पत्ति करता रहा, लेकिन एक घाटी की स्वाभाविक क्षमता को सीमित करके खास पहचान के काबिल बन गया। किसी भी पर्यटक स्थल पर सेक्स रैकेट के खूंखार पंजे उस विश्वास और छवि को नोचने में कामयाब रहेंगे, जो हिमाचल की सादगी से निकला संबोधन है या प्रकृति की पवित्रता के आंचल में सुरक्षित दस्तूर हैं। हमें यह सोचना है कि हिमाचल किस छवि का पर्यटन राज्य अंगीकार हो। इसमें दो राय नहीं कि कई तरह के सांस्कृतिक मूल्यों, व्यवहार, शिष्टाचार और उच्छृंखलताओं के मिलन से पर्यटन का संसार दिखाई देता है, फिर भी यह मर्यादा हिमाचल को तय करनी है कि किस सीमा तक सैलानियों को स्वीकार करे। जाहिर तौर पर हिमाचली पर्यटन में कई गलियां समाहित हो रही हैं और उन्हीं में से एक नशे की खेप में खुद को सराबोर कर रही है। डमटाल में नशे की ओवरडोज से दो युवकों की मौत जब चीखती है, तो कानून-व्यवस्था के परखच्चे उड़कर हमारी आंखों में किरचन ही पैदा करते हैं, क्योंकि मरने वाले पंजाब के युवा थे, तो क्या नशे का पर्यटन टोह लेता हुआ हिमाचल को सुरक्षित मान रहा है। क्या हमारी पुलिस इतनी सख्त नहीं हो सकती कि कोई पर्यटन के हुलिए में आकर कानून-व्यवस्था की धज्जियां न उड़ा सके। हिमाचल के सीमांत क्षेत्रों में नशे की तस्करी अगर संगठित अपराध का परिचय है, तो पुलिस बंदोबस्त बदलना होगा। बीबीएन की तर्ज पर नूरपुर को अलग पुलिस जिला चिन्हित करके सशक्त किया जा सकता है, ताकि अपराध के फन तीव्रता से कुचले जा सकें। प्रदेश की कानूनी हिफाजत को देखते हुए हिमाचल सरकार को शिमला, कांगड़ा तथा मंडी जिलों में पुलिस आयुक्तालय बनाकर सामान्य से हर तरह के अपराध के नियंत्रण में शक्तियों का विकेंद्रीयकरण तथा प्रबंधन में चुस्ती लानी होगी। महज पर्यटन के कारण प्रदेश की कुल आबादी से तीन गुना से भी अधिक बाहरी लोग आते हैं, तो चौकसी का अंदाज व प्रबंधन बदलना चाहिए। पुलिस पैट्रोलिंग को पर्यटन से जोड़ने की खास हिदायतें, प्रशिक्षण तथा प्रबंधन की जरूरत है। अंततः ऐसे अपराधों से हिमाचल प्रदेश की छवि पर प्रतिकूल असर ही पड़ता है, जबकि इनके मूल में ज्यादातर बाहरी तत्त्व ही माहौल बिगाड़ रहे हैं।

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