अब तीन नेताओं का संतुलन

उम्मीदों के जश्न और सत्ता की भागीदारी में हिमाचल को सदा न्याय की दरकार रही है और नरेंद्र मोदी सरकार के लौटते कदम फिर ‘नई खबर’ को आहट से भर देते हैं। राष्ट्रीय योजनाओं के अतिरिक्त अपने भाग्य जगाने की हिमाचली नीतियां जब तक क्षेत्रवाद के सोच से ऊपर नहीं उठतीं, हासिल उपलब्धियां केवल व्यक्तिनिष्ट हो जाएंगी। हिमाचल और केंद्र में भाजपा सरकारों के आलोक में प्रदेश को जिस संतुलन की आवश्यकता है, वह अब तीन नेताओं पर निर्भर करेगा। बतौर मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर को अब यह तय करना होगा कि राज्य की प्रगति के संदेश किस तरह हर छोर को छूते हैं। इसी तरह अनुराग ठाकुर अब महज सांसद नहीं, बल्कि केंद्र सरकार में हिमाचल के प्रतिनिधि हैं, लिहाजा उन्हें सारे प्रदेश की महत्त्वाकांक्षा में खुद को साबित करना होगा। अतीत में बतौर स्वास्थ्य मंत्री जगत प्रकाश नड्डा ने प्रदेश की पलकें खोली थीं, तो अब संगठन के दायरे में उनके बढ़ते राजनीतिक प्रभाव से हिमाचल की नई समीक्षा और नेतृत्व की जरूरत है। हिमाचल के कई युवा चेहरे भाजपा के भविष्य में प्रदेश की क्षमता का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं, लेकिन वर्तमान राजनीति ने संकीर्णता ओढ़ रखी है। जाहिर तौर पर धर्मशाला और पच्छाद के उपचुनावों में भाजपा किन उम्मीदवारों को सींचती है, इस पर जगत प्रकाश नड्डा और जयराम ठाकुर के बीच संतुलन और सहमति की ऊर्जा देखी जाएगी। क्या हिमाचल भाजपा और सत्ता उपचुनावों को महज सियासी प्राथमिकताओं से जोड़ती है या प्रदेश की मर्यादाओं और जनता के विश्वास का नाता इससे जुड़ता है, यह भी देखना होगा। जो भी हो हिमाचल की करवटों में कुछ ऐतिहासिक क्षण देखे जा सकते हैं और इसकी शुरुआत मोदी की दूसरी पारी और नड्डा-अनुराग की बदलती पारियों का समीकरण है। बेशक अनुराग ठाकुर को स्वतंत्र प्रभार से सुसज्जित राज्य मंत्री का ओहदा न मिला हो, लेकिन वित्त व कारपोरेट मंत्रालय में उनकी मौजूदगी का असर हिमाचल देख सकता है। हिमाचल की दृष्टि से ऐसी कई परियोजनाएं लंबित हैं, जिन्हें वित्त मंत्रालय के कान पूरी तरह नहीं सुनते। बतौर मंत्री अनुराग ठाकुर भले ही अपने संसदीय क्षेत्र को अहमियत देंगे, लेकिन उनके प्रदर्शन की शर्तों से पूरा प्रदेश बंधा है। हिमाचल की कमोबेश हर सरकार ने केंद्रीय योजनाओं से खुद का निर्वहन किया है, लेकिन भविष्य संवारने के लिए केंद्र से वित्तीय अड़चनें हमेशा रहीं। मसलन विशेष राज्य की श्रेणी में हिमाचली अधिकारों की कतरब्यौंत जारी है और कुछ इसी तरह का संताप औद्योगिक पैकेज के बंद होने के बाद खड़ी हुई परिस्थितियों में झांका जा सकता है। स्मार्ट सिटी व हवाई अड्डों के विस्तार जैसी परियोजनाओं में अगर नब्बे प्रतिशत वित्तीय भागीदारी केंद्र की नहीं होगी, तो हिमाचल के अरमान अधूरे ही रहेंगे। ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के अति भरोसेमंद तथा पार्टी व सत्ता के संतुलन में अहम भूमिका निभाते रहे जगत प्रकाश नड्डा की नई पारी से यह प्रदेश मुखातिब रहेगा। हिमाचल की दृष्टि से जगत प्रकाश नड्डा अब राष्ट्रीय मंच के अहम किरदार हैं और जाहिर तौर पर उनका संगठनात्मक कौशल सामने आएगा। ऐसे में उनके गृह राज्य की राजनीतिक शक्ति व सत्ता से जुड़ी पहचान अब सीधे उनसे जो पाना चाहेगी, उस पर राज्य का दारोमदार टिका है। राज्य के प्रति उनके अपने ड्रीम प्रोजेक्ट हैं और इनके साथ कसरत करती लोकसभा व राज्यसभा के सांसदों की संवेदना जुड़ती है। प्रदेश की सड़क, रेल व विमानन परियोजनाओं के अलावा विस्थापितों के मसले पर नड्डा की भूमिका इस बार कहीं अधिक रेखांकित है। देखना यह भी होगा कि प्रदेश सरकार केंद्र में जगत प्रकाश नड्डा और अनुराग ठाकुर को किस प्रकार अपने दो बाजू बनाती है। डेढ़ साल की जयराम सरकार के सामने लोकसभा चुनाव जीतने की परीक्षा सफलतापूर्वक पूरी हो चुकी है, लेकिन अब स्थानीय निकायों व अगले विधानसभा चुनावों तक खुद को प्रदर्शित करने की प्रतिज्ञा लेनी पड़ेगी। इसके लिए मंत्रिमंडल में फेरबदल तथा विभागीय आबंटन की दुरुस्ती जहां आवश्यक है, वहीं प्रदेश के भावनात्मक, भौगोलिक, आर्थिक व विकासात्मक संतुलन को शिद्दत से कायम रखने की चुनौती भी है।

 

 

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