असंवेदना की चिता

Jun 22nd, 2019 12:05 am

यह असंवेदना की चिता से उठता हिमाचली परिवहन व्यवस्था का धुआं है, जो वर्षों से हकीकत को ओझल कर रहा है। एक साथ चवालीस लोग इसी धुएं में अदृश्य हो गए, लेकिन न जाने कब हमारी अकर्मण्यता तृप्त होगी। कितने खिलौने कुल्लू में टूटे, कितने घर उजड़े और कितने पल छीन लिए इस मातमी सन्नाटे ने। परिवहन मंत्री के ही जिला में बस दुर्घटना की खामियों में पूरा हिमाचल सिसक उठा है कि आखिर जिम्मेदारी व जवाबदेही होती क्या है। क्या हम मंत्री इसलिए बनाते हैं कि वह स्वागत समारोहों का मंगलगान सुनें, नाटियां डालें या इस मातम को ओढ़कर देखें कि व्यवस्था की नाकामी ने इनसानी खून से क्यों लिख दीं हजारों आहें। दो दर्जन बच्चे तो महज इसलिए सवार थे कि उनकी मंजिल का सफर किसी शिक्षण संस्थान में भविष्य की आंखें खोलना चाहता था। कुछ दैनिक जरूरतों की खातिर बस में चढ़े, तो कुछ सामाजिक मेलजोल की रफ्तार में आगे बढ़ने की डगर पर थे, लेकिन यह बस नहीं – फिर ताबूत बनकर पेश आई। क्या हम इसे मात्र एक दुर्घटना के तौर पर देखकर तमाम जिम्मेदारियोें से बच जाएंगे, प्रायश्चित की कानूनी छड़ी पकड़ लेंगे या नैतिकता भरा कोई संदेश निकल आएगा। जांच के न जाने कितने दर्पण पहले भी लटके, मगर इनमें किसी परिवहन मंत्री ने झांक कर नहीं देखा। देखते तो कोई खटारा बस बंजार से गाड़ागुशैणी रूट पर चलने की गुस्ताखी नहीं करती और न ही नौसिखिया चालक, ड्राइविंग सीट का हकदार होता। हमारी संवेदना और प्राथमिकता अगर सियासी घोषणाओं से बाहर निकलकर कुछ कर पाती, तो दुर्घटना स्थल पर क्रैश बैरियर या पैरापिट इतनी मजबूती से खड़े होते कि बस इस तरह के हादसे से बच जाती। पिछली दर्जनों दुर्घटनाओं के बाद कुछ नहीं बदला, भले ही अधिकारी या मंत्री बदलते रहे हों। जांच की सूक्ष्म परिधि से क्या लेना, अगर मौत को रोकने का इंतजाम नहीं। आज तक दुर्घटनाओं के बाद न्याय किसे मिला। ले देकर मुआवजा, कुछ निलंबन या एक दो बैठकें बस। सड़क पर चलें तो मालूम होगा कि यातायात कितना आत्मघाती हो गया है और खास तौर पर निजी बसों की प्रतिस्पर्धा, दोपहिया वाहन चालक युवाओं की रफ्तार तथा टैक्सी चालकों के उन्माद के बीच बचकर निकलना चमत्कार से कम नहीं। कहीं दूर-दूर तक परिवहन नीति नजर नहीं आती। ट्रैफिक पुलिस केवल वीआईपी ड्यूटी में मशगूल दिखाई देती है, तो यातायात संचालन के बजाय ट्रांसपोर्ट माफिया के फैलते अंदाज में एक अफरा-तफरी भरी व्यवस्था से दो-चार होना पड़ता है। कहने को हेल्मेट पहनना अनिवार्य है, लेकिन कोई किसी को नहीं रोक रहा। तंग सड़कों पर डबल एक्सल वोल्वो की सवारी पर हमारा कानून खामोश है, तो टैक्सियां सीधे-सीधे आम जनता के सामने गुंडई अंदाज का प्रदर्शन है। पूरे प्रदेश में कहीं कोई पैट्रोलिंग की व्यवस्था नहीं और न ही परिवहन विभाग यह देख रहा है कि पुराने वाहनों के व्यापार ने कितने खटारा और नाकारा वाहन हिमाचल में उतार दिए। खुद एचआरटीसी अपनी जीरो वैल्यू बसों को लंबी दूरी के रूटों पर दौड़ाकर संतुष्ट है, जबकि लो फ्लोर बसों का जखीरा राज्य के धन को बर्बाद कर रहा है। यहां सार्वजनिक निर्माण की गलतियां भी बारूद की तरह सड़कों पर बिखरी हैं। अब तो सभी को पता है कि प्रदेश में कहां और कितने ब्लैक स्पॉट या दुर्घटना को निमंत्रण देते मोड़ हैं, लेकिन अनभिज्ञ बने रहने की काबिलीयत में पीडब्ल्यूडी का साम्राज्य केवल ठेकेदारी के आंगन में आबाद है। हिमाचल में बढ़ते यातायात, परिवहन के दबाव तथा बदलती जीवनशैली की प्रतिस्पर्धा के बीच सरकार को अपनी भूमिका की सतर्क निगरानी व हस्तक्षेप बढ़ाने पड़ेंगे, वरना मौत से खेलते मंजर के लिए हमारे पास कोई जवाब नहीं बचेगा।

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