आंतरिक अनुभव

सद्गुरु  जग्गी वासुदेव

आप जब आदर्श की बात करते हैं, तो इसका अर्थ है ऐसा जीवन जो दूसरों के लिए अच्छा उदाहरण बनता है, लेकिन रूमी, कबीर और उनके जैसे अन्य लोग, हमें केवल उनका आनंद लेना चाहिए। हमें उनकी नकल नहीं करनी चाहिए। वे बागीचे के फूलों जैसे हैं, आप फूल बनने की कोशिश नहीं करते। आप बस फूलों का आनंद लेते हैं। ये बहुत अच्छा हुआ कि ऐसे लोग अलग-अलग स्थानों पर खिले। ऐसे बहुत से लोग हैं जो खिले हैं। आज भी हर शहर में, गांव में ऐसा कोई न कोई है। शायद उनको उस स्तर की लोकप्रियता न मिली हो। किसी को उच्च स्तर प्राप्त होता है, किसी को नहीं होता। यह एक सामाजिक और ऐतिहासिक बात है, लेकिन वह पहलू खत्म नहीं हुआ और कभी हो भी नहीं सकता। कहीं न कहीं, ये कई प्रकार से अभिव्यक्त होता है। अपने लिए किसी एक कबीर को उदाहरण बनाने के बजाय हमें कबीर के उस आंतरिक अनुभव की ओर देखना चाहिए, जिसने उन्हें ऐसा प्रभावशाली मनुष्य बनाया था। जब बाहरी योग्यताओं की बात होती है तो हम सब में अलग-अलग योग्यताएं हैं। जो आप कर सकते हैं वो मैं नहीं कर सकता, जो मैं कर सकता हूं, वो आप नहीं कर सकते। लेकिन जब अंदरूनी संभावनाओं की बात होती है तो हम सब समान रूप से योग्य हैं। ये एक व्यक्ति में क्यों खिलती है और दूसरे में क्यों नहीं खिलती,  ये सिर्फ  इसलिए है कि उस एक व्यक्ति ने उस आयाम की ओर ध्यान दिया है, दूसरे ने नहीं। कबीर जो कुछ भी थे, रूमी, कृष्ण, आदियोगी जो कुछ भी थे, हम सब में भी वह योग्यता है। पर क्या हमारी कविता लिखने की या नृत्य, संगीत, गणित के विषय में भी वही योग्यता है? शायद नहीं! लेकिन हम सब में वह योग्यता है कि हम उस विशिष्ठ अनुभव को पा सकें, जो उन्होंने पाया। जब ये अनुभव कबीर में घटित हुआ, तो संभवतः उस समय की सामाजिक एवं अन्य परिस्थितियों के अनुसार उनका अनुभव सुंदर काव्य के रूप में अभिव्यक्त हुआ। आज अगर ये अनुभव किसी में घटित होता है, तो वे कुछ एकदम अलग कर सकते हैं। वे वो काम नहीं करेंगे। वह आंतरिक अनुभव जिसकी वजह से काव्य, नृत्य, संगीत, गणित या विज्ञान उत्पन्न होते हैं, वह ज्यादा महत्त्वपूर्ण है, बजाय इसके कि एक व्यक्ति विशेष में किस तरह की अभिव्यक्ति होती है।

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