आंदोलन में कई लोग हुए जख्मी

तहसील रामपुर के ‘गौरा’ तथा ‘धार क्षेत्र’ में कुछ हरिजन बेठुओं ने अपने अधिकारों के विषय को लेकर एक आंदोलन चलाया, जिसमें रियासत की पुलिस को बंदूक चलानी पड़ी और कुछ व्यक्ति घायल भी हो गए। आंदोलनकारियों ने पुलिस तथा अन्य रियासती कर्मचारियों को, जो मौके पर आंदोलन को नियंत्रण में लाने के लिए पहुंचे हुए थे, पकड़ लिया और उन पर काबू पाकर उन्हें बंदी बना लिया…

गतांक से आगे …

बुशहर रियासत में प्रजामंडल आंदोलन ः 17  तहसील रामपुर के ‘गौरा’ तथा ‘धार क्षेत्र’ में कुछ हरिजन बेठुओं ने अपने अधिकारों के विषय को लेकर एक आंदोलन चलाया, जिसमें रियासत की पुलिस को बंदूक चलानी पड़ी और कुछ व्यक्ति घायल भी हो गए। आंदोलनकारियों ने पुलिस तथा अन्य रियासती कर्मचारियों को, जो मौके पर आंदोलन को नियंत्रण में लाने के लिए पहुंचे हुए थे, पकड़ लिया और उन पर काबू पाकर उन्हें बंदी बना लिया। किसी के बीच-बचाव करने पर आंदोलनकारी जो लगभग सभी हरिजन थे तथा सब्रमशनू गांव के निवासी अनुलाल के नेतृत्व में चले हुए थे के पकड़े हुए सरकारी कर्मचारियों को रामपुर लाए और इस प्रकार कर्मचारियों को आंदोलनकारियों के हाथों किसी अधिक अप्रिय घटना से बचा लिया था। इस के साथ ही एक ओर भारत सरकार को तथा दूसरी ओर क्षेत्रीय प्रजामंडल तथा अखिल भारतीय कांग्रेस पार्टी को भी सूचनाएं चली गई थीं। थोड़े समय में शिमला से दीवान  बलदेव सिंह के नेतृत्व में पर्याप्त संख्या में पुलिस की सहायता पहुंच गई और आंदोलनकारियों के कुछ नेताओं को पकड़ लिया गया। इसमें सत्यदेव बुशहरी और अनुलाल अग्रिम नेता थे। इन पर मुकदमे चलाए जाने लगे, परंतु कुछ लोगों के बीच-बचाव करने पर भारत सरकार के आदेश से वे सभी छोड़ दिए गए। इस लड़ाई में कई सारे लोग मारे गए। मारे गए अांदोलनकारियों को पुलिस ने पत्थरों से बांध कर सतलुज नदी में फेंक दिया था। प्रजातांत्रिक आंदोलन का दमन करने का यह एक अनूठा उदाहरण था। राजा पद्म सिंह ने प्रजामंडल वालों की प्रतिनिधत सभा बनाने की मांग स्वीकार कर ली और यह किया गया कि 18 अप्रैल, 1847 को इस निर्णय को लागू किया जाए, परंतु इन्हीें दिनों में राजा पद्म सिंह की मृत्यु हो गई और इसे कार्यान्वित नहीं किया जा सका। पोलिटिक्ल एजेंट ने काउंसिल आफ रिजेंसी और काउंसिल आफ एडमिनिस्ट्रेशन के परामर्श से एक अंतरिम काउंसिल बनाई, ताकि वह 18 मई, 1947 का एक प्रतिनिधि सरकार बनाने की योजना तैयार की जा सके। इसमें लोगों के प्रतिनिधियों  को विश्वास में नहीं लिया गया। अतः उन्होंने अपना आंदोलन जारी रखा, परंतु अंतरिम काउंसिल ने विधान परिषद के लिए अक्तूबर, 1947 में चुनाव करने का फैसला किया तो सत्यदेव बुशहरी वाले गुट के प्रजामंडल ने चुनाव में भाग लेने का फैसला किया। प्रजामंडल वालों ने सभी स्थान जीते। प्रजामंडल के सदस्यों ने काउंसिल आफ एजेंसी से विधान परिषद की अधिवेशन बुलाने के लिए अनुरोध किया। केंद्र सरकार के राज्य मंत्रालय से भी अनुरोध किया गया कि वे इसमें हस्तक्षेप करे। 15 अगस्त, 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ।

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