आत्म पुराण

इसके लिए शिष्य ने पूछा, हे भगवन! अपने दशम अध्याय के अंत में कहा था कि जावाल आदि उपनिषदों में जो संन्यास धर्म तथा हंस आदि उपनिषदों में योग का वर्णन किया गया है, उसका आश्रम लेकर मनुष्य आत्म साक्षात्कार में समर्थ होता है। हे भगवन! हमारी अब यही प्रार्थना है कि आप हमको इन्हीं उपनिषदों में वर्णित परमहंस संन्यास का स्वरूप श्रवण कराएं। यह सुनकर श्री गुरुदेव कहने लगे-हे शिष्य! तुम्हारा प्रश्न बहुत विस्तृत है और इसके उत्तर में जायाल, गर्भ, अरुण, परमहंस आदि सभी उपनिषदों का भावार्थ आ जाएगा। ‘जाबाल’ उपनिषद् के चतुर्थ खंड में जनकर राजा ने याज्ञवल्क्य मुनि से परमहंस संन्यास का प्रश्न किया है। आरुणेय उपनिषद में अरुण ऋषि ने प्रजापति से परमहंस का धर्म पूछा है। अब हम तुमको इन्हीं उपनिषदों के आधार पर परमहंस-धर्म का वर्णन करते हैं, तुम सावधान होकर सुनो। हे शिष्य! देवताओं का गुरु जो बृहस्पति है, उसका एक भाई सम्वर्त नाम का ऋषि था, उसने पूर्वकाल में परमहंस संन्यास ग्रहण किया था। फिर उद्दालक, श्वेतकेतु, दुर्वासा, ऋतु, निदाघ, जड़भरत, दत्तात्रेय, श्वेत, भारद्वाज आदि ने भी इस परमहंस संन्यास को ग्रहण किया था। यहां हम इन प्रसिद्ध संन्यासियों के अव्यक्त चिह्न तथा आचार्यों का वर्णन करते हैं, जिन चिह्न और आचार को लोग समझ नहीं सकते, उसे अव्यक्त कहते हैं। हे शिष्य! संवर्त आदि पूर्ववर्ती संन्यासी नियमपूर्वक मुंडित भी नहीं हुए थे और न जटाधारी बने थे। वे नियमपूर्वक एक दंड अथवा तीन दंड को भी धारण करते थे और न रक्त वस्त्र। उन ब्रह्मवेता संन्यासियों चिह्न जिस प्रकार अव्यक्त था, उसी प्रकार उनका आचार भी अव्यक्त था।

शंका-हे भगवन! वह अव्यक्त किस प्रकार होता है? समाधान हे शिष्य! वे महात्मा पुरुष अव्यक्त व्यवहार करते हुए ही लोक में विचरते थे। कभी तो वे सब पदार्थों की इच्छा से रहित होते थे और कभी वे आसक्त पदार्थों की तरह अनेक पदार्थों की इच्छा भी करते थे। कभी वे सर्वज्ञ प्रतीत होते थे और कभी अज्ञानी की तरह जान पड़ते थे। कभी वे शास्त्रवेत्ता पंडित जान पड़ते थे और कभी शास्त्र रहित मूढ़ प्रतीति होते थे। कभी तो वे बुद्धिमान पुरुषों की तरह नाना प्रकार की चेष्टा करने लगते थे और कभी जड़ पुरुष की तरह सब चेष्टाओं से शून्य दिखाई देते थे। कभी वे राग में पड़े पामर पुरुषों का सा आचरण करते थे और कभी परम विरक्त जाने पड़ते थे। कभी श्रेष्ठ पुरुषों की तरह शास्त्रानुकूल कार्य करते थे और श्रेष्ठ अपुरुषों की तरह शास्त्र विरुद्ध कार्य करने लग जाते थे। हे शिष्य! इस प्रकार वे परमहंस संन्यासी अव्यक्त चिन्ह और अव्यक्त आचरण को धारण कर लोक में भी विचरण करते रहते थे। उनको देखकर कोई यह नहीं जान सकता था। कि ये श्रेष्ठ पुरुष हैं अथवा अश्रेष्ठ हैं। कोई यह नहीं जान सकता था कि यह बहुत से शास्त्र पढ़े हैं अथवा कुछ भी नहीं पढ़े हैं। यह भी नहीं जाना सकता था कि यह उत्तम ब्राह्मण हैं या चांडाल हैं। न यह पता लगता था कि ये संन्यासी हैं या गृहस्थ हैं। हे शिष्य! उन संन्यासियों को देखकर कोई बुद्धिमान पुरुष भी यह नहीं जान सकता था कि वे किस वर्ण के अथवा किस आश्रम के हैं? इस विषय में भी शास्त्रों में कहा है।

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