आध्यात्मिक दृष्टि

श्रीराम शर्मा

जीवन रोगों के भार और मार से बुरी तरह टूट गया है। जब तन के साथ मन भी रोगी हो गया हो,तो इन दोनों के योगफल के रूप में जीवन का यह बुरा हाल भला क्यों न होगा? ऐसा नहीं है कि चिकित्सा की कोशिशें नहीं हो रही। चिकित्सा तंत्र का विस्तार भी बहुत है और चिकित्सकों की भीड़ भी भारी है, पर समझ सही नहीं है। जो तन को समझते हैं, वे मन के दर्द को दरकिनार करते हैं और जो मन की बात सुनते हैं, उन्हें तन की पीड़ा समझ नहीं आती। चिकित्सकों के इसी द्वंद्व के कारण तन और मन को जोड़ने वाली प्राणों की डोर कमजोर पड़ गयी है। पीड़ा बढ़ती जा रही है, पर कारगर दवा नहीं जुट रही। जो दवा ढूंढी जाती है, वही नया दर्द बढ़ा देती है। प्रचलित चिकित्सा पद्धतियों में से प्रायः हर एक का यही हाल है। यही वजह है कि चिकित्सा की वैकल्पिक विधियों की ओर सभी का ध्यान गया है, लेकिन एक बात जिसे चिकित्सा विशेषज्ञों को समझना चाहिए, उसे नहीं समझा गया। समझदारों की यही नासमझी सारी आफतों, मुसीबतों की जड़ है। यह नासमझी की बात सिर्फ  इतनी है कि जब तक जिंदगी को सही तरह से नहीं समझा जाता,तब तक उसकी संपूर्ण चिकित्सा भी नहीं की जा सकती। जीवन तन और मन के जोड़ से कुछ अधिक है। इसमें अंतर्भावना, अंतर्चेतना एवं अंतरात्मा जैसे अदृश्य आयाम भी हैं। शारीरिक अंगों की गठजोड़ को बायलॉजी पर आधारित मेडिकल साइंस से समझा जा सकता है। मन की चेतना अचेतन परतें साइकोलॉजी द्वारा पढ़ ली जाती है। पर अतिचेतन की इबारत कौन पढ़े? प्रारब्ध और संस्कारों का लेखा-जोखा कौन संभाले। ये गहरी बातें तो अध्यात्म विद्या से ही समझी जाती है। आध्यात्मिक दृष्टि से ही जीवन की यथार्थता और संपूर्णता पता चलती है। इस संपूर्णता के बलबूते की संपूर्ण चिकित्सा का विधान संभव है। यही वजह है कि अध्यात्म विद्या, आध्यात्मिक दृष्टि एवं आध्यात्मिक चिकित्सा की जरूरत को आज सभी अनुभव कर रहे हैं। इस पुस्तक के लेखक के रूप में मैंने इन आध्यात्मिक सत्यों को जिया है, अनुभव किया है। युगऋषि परम पूज्य गुरुदेव के सान्निध्य, साहचर्य एवं सेवा में जीवन के जो पल बीते है, वे अनिवर्चनीय अनुभूतियों एवं  उपलब्धियों से भरे रहे हैं। गुरुदेव अध्यात्म विद्या एवं अध्यात्म चिकित्सा के परम विशेषज्ञ थे। उनकी इस विशेषता के क्षितिज में आध्यात्मिक चिकित्सा की नित नई आभा को बिखेरते विकीर्ण होते हुए मैंने अपनी इन्हीं आंखों से देखा है। कई अवसरों पर उन्होंने स्वयं मुझे अपने पास बैठाकर आध्यात्मिक चिकित्सा की सच्चाई को बताया और समझाया। उनके श्रीमुख से जो सुना और उनके श्री चरणों में बैठकर जो सीखा, उसी को पाने की चेष्टा की है। इस में जो कहा गया है, वह न गं्रथों के अध्ययन का सार है और न शब्दों का गठजोड़। यह तो समझने की बात है।

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