इंग्लैंड में क्रिकेट के अलावा कोर्ट में भी आमने-सामने हैं भारत-PAK, 3 अरब रु का है मामला

इंग्लैंड में चल रहे क्रिकेट विश्व कप के जंग में तो भारत ने पाकिस्तान को शिकस्त दे दी है लेकिन क्या 3 अरब रुपये से भी ज्यादा की रकम की लड़ाई में भारत पाकिस्तान के मुकाबले बाजी मार पाएगा. इसका फैसला ब्रिटेन की कोर्ट में होगा. दरअसल  1947 में भारत से अलग होने के 70 साल बाद अब पाकिस्तान उस वक्त ब्रिटेन के बैंक में हैदराबाद के निजाम के जमा कराए पैसों पर अपना दावा ठोंक रहा है. 35 मिलियन यूरो यानी करीब 3 अरब, 7 करोड़ 15 लाख, 82 हजार 500 रुपये की बड़ी रकम भारत की होगी या फिर पाकिस्तान की अब यह ब्रिटेन की अदालत के फैसले पर निर्भर करता है. 1947 में देश विभाजन के वक्त हैदराबाद के निजाम ओसामा अली खान ने पाकिस्तान को  1,007,940 यूरो लंदन के नैटवेस्ट बैंक में सुरक्षित रखने के लिए दिया था. अब ब्याज समेत यह रकम बढ़कर 35 मिलियन हो चुकी है जिस पर पाकिस्तान अपना दावा ठोंक रहा है.दूसरी तरफ निजाम के वंशज भी इस रकम पर अपना दावा कर रहे हैं और उसके लिए उन्होंने भारत सरकार से कानूनी मदद मांगी थी जिसके बाद केंद्र सरकार ने पाकिस्तान के खिलाफ ब्रिटेन की अदालत में दावा प्रस्तुत किया. हैदराबाद के आठवें निजाम प्रिंस मुकर्रम जाह और उनके छोटे भाई मफखम जाह ने लंदन में नैटवेस्ट बैंक के साथ 35 मिलियन यूरो से अधिक के फंड के लिए पाकिस्तान सरकार के खिलाफ कानूनी लड़ाई में भारत सरकार के साथ हाथ मिलाया है. पाकिस्तानी चैनल जियो न्यूज की रिपोर्ट के मुताबिक 1948 में पाकिस्तान के अस्तित्व में आने के बाद हैदराबाद के तत्कालीन निजाम ने ये पैसे ब्रिटेन में उच्चायुक्त को स्थानांतरित कर दी थी. तब से यह राशि नैटवेस्ट बैंक में पड़ी हुई है और इसकी कीमत, ब्याज के रूप में, लगभग 70 वर्षों में बढ़कर 35 मिलियन पाउंड तक पहुंच चुकी है. न्यायमूर्ति मार्कस स्मिथ की अध्यक्षता में दो हफ्ते तक चली सुनवाई में ब्रिटेन में पाकिस्तान के उच्चायुक्त बनाम सात अन्य के रूप में इस केस को सूचीबद्ध कर सभी पक्षों के तर्क को सुना गया. भारत बतौर संघ और देश के राष्ट्रपति इस मामले में  निजाम के पूर्वज के तौर पर एक पक्ष हैं. 3 अरब रुपये से ज्यादा की इस रकम के मामले में कोर्ट के जज अगले दो महीने के भीतर अपना फैसला देंगे. इस केस में उम्मीद है कि जज इस बात का जवाब देंगे कि आखिर इतनी बड़ी राशि का असली हकदार या मालिक कौन है. हालांकि इस मामले में पाकिस्तान का तर्क है कि हैदराबाद के निजाम ने पाकिस्तान के लिए पैसा पहले भेजा था. पाकिस्तान का तर्क है कि 1948 में भारत की घोषणा के दौरान पाकिस्तान ने जो निजाम को मदद दी थी उसी के बदले निजाम की तरफ से पाकिस्तान के लोगों को यह तोहफा दिया गया था.

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