ईको फ्रेंडली सस्ते घरों का निर्माण

Jun 26th, 2019 12:05 am

शक्ति चंद राणा

लेखक, बैजनाथ से हैं

 

यदि आधुनिक तकनीक विज्ञान के साथ तालमेल कर ऐसे मकानों को बनाने की ओर सरकार ध्यान दे, तो पर्यावरण को भी नुकसान कम होगा, बेतहाशा खड्डों, नदियों का दोहन नहीं होगा, अपितु ऐसे मकान विश्व के बढ़ते हुए तापमान के मद्देनजर लाभदायक साबित हो सकते हैं। जरूरत केवल इस सामग्री के आधुनिक दिशा-निर्देशों तकनीक इत्यादि के साथ समन्वय बिठाने की है…

रोटी, कपड़ा और मकान हर समाज, हर व्यक्ति की मूलभूत आवश्यकताएं हैं। आज भारत सरकार बेघर लोगों के लिए लाखों करोड़ों की संख्या में घरों के निर्माण की योजना को लेकर विभिन्न राज्यों में उन लोगों को घर बनवा कर दे रही है, जिनके पास अपना घर नहीं है। यह योजना अपनी जगह वर्तमान में ठीक हो सकती है, लेकिन दूसरे नजरिए से देखें, तो यह योजना ऐसी मनोवृत्ति को बढ़ावा दे रही है, जिसे मुफ्त की संस्कृति भी कहते हैं। जब तक हम भारत की बढ़ती जनसंख्या पर और शरणार्थियों के धड़ाधड़ भारत में घुस आने के क्रम को कानून द्वारा सख्ती से नहीं रोकेंगे, यह बढ़ती हुई जनसंख्या तमाम अनुमानों और योजनाओं को ध्वस्त करती जाएगी। अतः ऐसे में सरकार का सबसे पहला कदम बढ़ती हुई आबादी पर नियंत्रण लगाना ही होना चाहिए। इस लेख के द्वारा मैं सरकार का ध्यान ईको फे्रंडली गृह निर्माण की प्राचीन कला की ओर आकर्षित करना चाहता हूं, जिसे हमारे पूर्वजों ने प्रकृति के साथ सौहार्दपूर्ण ढंग से बना कर रहना सीखा।

आज की वास्तुकला के विशेषज्ञ भी इस बात से परिचित हैं कि उस प्राचीन भवन निर्माण कला का आज भी कोई सानी नहीं है। मोहनजोदड़ों और हड़प्पा की खुदाई में मिले बहुत सारे अवशेषों में क्या बर्तन, तो क्या घर गृह निर्माण में उपलब्ध मिट्टी का विशेष महत्त्व रहा था। उसे अगर हम छोड़ भी दें और आज से सत्तर सौ साल पहले की बात करें, तो हिमाचल प्रदेश की तरह भारत के कितने ही राज्यों में लोग पक्के कंकरीट अथवा भट्ठे की ईंटों के बने घरों के स्थान पर लकड़ी और मृदा, स्थानीय घास की मदद से बनने वाले घरों में ही रहना पसंद करते थे। इन मिट्टी के बने घरों की दीवारें कहीं बारह-पंद्रह इंच मोटी और कहीं-कहीं अठारह से चौबीस इंच मोटी भी हुआ करती थीं, जो शुद्ध मिट्टी की बनी भी होती थीं और मिट्टी की बनी ईंटों की भी होती थी, जिन ईंटों को धूप में सुखा कर तैयार किया जाता था। ऐसी ईंटों से बने मकानों की छतों को लकड़ी, बांस अथवा लोहे के एंगलों से बना कर ऊपर खजूर के पत्तों को बिछाकर मिट्टी के गारे से तीन-चार इंच मोटी तह से बनाया जाता था। ऐसे मकान गर्मियों में ठंडे और सर्दियों में गर्म रहते थे, जो आजकल के पक्की ईंटों के बने मकानों से हजार गुना बेहतर रहने लायक हुआ करते थे। आज पक्के मकानों के फैशन ने न केवल पर्यावरण को नुकसान पहुंचाया है, अपितु इन मकानों में गर्मियों में अधिक गर्मी और सर्दियों में अधिक सर्दी के कारण लोगों का जीवन कष्टप्रद होता जा रहा है। मिट्टी के कच्चे घरों के भीतर का फर्श सप्ताह में गाय के गोबर में हरा रंग डालकर उसकी लिपाई करने से कई प्रकार के बीमारी के कीटाणुओं का स्वतः ही नाश हो जाता था। ऊपर की छत पर भोजन व्यवस्था व रसोई होने के कारण रोजाना ऊपर-नीचे आने-जाने से घुटनों की कसरत भी हो जाती थी। जिन पहाड़ी क्षेत्रों में लकड़ी की बहुतायत थी, उन क्षेत्रों में लोग मिट्टी, पत्थर व लकड़ी तीनों का या दोनों का मिश्रित प्रयोग कर घर बनाते थे। ये घर पूरी तरह से भूकंपरोधी भी होते थे और पर्यावरण के साथ मैत्रीपूर्ण समन्वय रखते हुए बनाए जाते थे। ऐसी मान्यता है कि मिट्टी के बने इन घरों की आयु पक्की ईंटों, सीमेंट आदि से बने घरों की तुलना में दो-तीन गुनी होती थी। ऊपर से लागत की दृष्टि से ये घर सस्ते भी पड़ते थे, जबकि पक्के मकानों का खर्च तुलना में अधिक, लेकिन आयु कम आंकी जाती है।

यदि आधुनिक तकनीक विज्ञान के साथ तालमेल कर ऐसे मकानों को बनाने की ओर सरकार ध्यान दे, तो पर्यावरण को भी नुकसान कम होगा, बेतहाशा खड्डों, नदियों का दोहन नहीं होगा, अपितु ऐसे मकान विश्व के बढ़ते हुए तापमान के मद्देनजर लाभदायक साबित हो सकते हैं। जरूरत केवल इस सामग्री के आधुनिक दिशा-निर्देशों तकनीक इत्यादि के साथ समन्वय बिठाने की है। इस ओर प्रयोगात्मक तौर पर शोध कर अगर हम अपनी प्राचीन वास्तुकला के साथ सामंजस्य बिठाने में सफल हों, तो यह कई मायनों में लाभकारी, सुखकारी, हितकारी साबित हो सकती है। वरना बढ़ते विश्व के तापमान में जीवन अत्यंत कष्टप्रद होने का अंदेशा साफ नजर आ रहा है। आज भी दोपहर को लोग कच्चे मकानों में स्वयं को अधिक सहज और आरामदेह पाकर दो घड़ी चैन से बिना पंखे-एसी से सो लेते हैं। कम खर्च से ज्यादा सुरक्षित इन मकानों की प्राचीन परंपरा को पुनः जीवित करना हर दृष्टि से फायदेमंद साबित होगा।

यदि आबादी पर नियंत्रण न लगाया गया, तो भारत भिखारियों, भूखे-नंगों और रोटी, कपड़ा, मकान के तलबगारों का ही देश बनकर रह जाएगा, जो तमाम शहरों की सड़कों, पगडंडियों पर अपना पुश्तैनी कब्जा बनाए रखेंगे। फ्री की संस्कृति वोट तो दे सकती है, पर देश को कमजोर बना कर।

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