ईश्वर को प्राप्त करना

स्वामी विवेकानंद

गतांक से आगे…

तब भी नरेंद्र श्रीरामकृष्ण की उन सब अपूर्व दर्शन आदि के प्रति खास श्रद्धावान न हो सके थे। उन्होंने कहा, मां ने दिखा दिया था या आपके दिमाग में ये ख्याल आया,  कैसे समझूं?।  मुझे तो महाराज यदि ऐसा होता तो यह विश्वास कर लेता कि मेरे मस्तिष्क का ही ख्याल है। मैं तुम्हारी बात की कोई सफाई नहीं देना चाहता। नरेंद्र एक दिन आएगा, जब अपने महत्त्व को तुम स्वयं जान लोगे। नरेंद्र ने घर लौट कर दर्शनशास्त्र और धर्म संबंधी पुस्तकों को फेंक दिया।  अगर वह पुस्तकें ईश्वर को प्राप्त करने में काम नहीं आ सकीं, तो उनके पढ़ने से ही क्या लाभ? रात भर जागकर नरेंद्र इस प्रकार की न जाने कितनी बातें सोचते रहे। अचानक दक्षिणेश्वर के उस अद्भुत प्राणी की बात उन्हें याद आ गई। स्पर्शकाल असहनीय उत्कंठा में बिताकर नरेंद्र सवेरा होते ही दक्षिणेश्वर की तरफ दौड़ पड़े। गुरुदेव के श्रीचरण कमलों के पास पहुंचकर उन्होंने देखा, सदानंदमय महापुरुष भक्तों से घिरे हुए अमृत उपदेश प्रदान कर रहे हैं। उनकी बातों से नरेंद्र के मन में मानों समुद्र मंथन शुरू हो गया था। उन्होंने सोचा अगर वे न कर दें, तो फिर क्या होगा? फिर वह किसके पास जाएंगे? अंतः प्रकृति के साथ बहुत देर तक संग्राम करने के बाद आखिर में वो जिस सवाल को महर्षि देवेंद्रनाथ से भी पूछ चुके थे और जो सवाल उनके मन में चुभ रहा था, वो ही सवाल उन्होंने रामकृष्ण के सामने रख दिया। महाराज, क्या आपने ईश्वर के दर्शन किए हैं? एक हल्की सी मुस्कराहट महापुरुष के मुखमंडल पर बिखर गई। उन्होंने तनिक भी न सोचते हुए फौरन जवाब दिया, बेटा मैंने ईश्वर के दर्शन किए हैं। तुम्हें जिस प्रकार सामने देख रहा हूं, तुमसे भी कहीं स्पष्ट रूप से ज्यादा मैंने उन्हें देखा है और नरेंद्र की हिम्मत को सौ गुना बढ़ाते हुए उन्होंने फिर से कहा, क्या तुम भी देखना चाहते हो? अगर मेरे कहे अनुसार काम करो, तो तुम्हें भी दिखा सकता हूं। श्रीरामकृष्ण की अपूर्व बोली को सुनकर नरेंद्र उछलता हुआ आनंद  मुहूर्त मात्र से ही संदेह के अंधकार में गायब हो गया। महापुरुषों की वाणी से उन्हें जिस पथ का संकेत मिला था, वह फूलों से बिछा हुआ न था। इसके लिए तो उन्हें इस अर्धोंमाद व्यक्ति के चरणों में पूर्ण रूप से आत्म सर्मपण कर तीव्र कठोर साधना में अग्रसर होना होगा। नरेंद्र ब्रह्म समाज के आदर्श से अनुप्राणित एकाएक श्रीरामकृष्ण को अपना गुरु न बना सके, मगर कुछ दिनों के पश्वात एक घटना घटी जिसके कारण वो ब्रह्म समाज से अपना संबंध तोड़ने को मजबूर हो गए। इस बार वे जब भी दक्षिणेश्वर से वापस लौटे तो फिर बहुत दिनों तक वहां नहीं गए। उधर नरेंद्र को देखने के लिए श्रीरामकृष्ण अत्यंत बैचेन हो उठे थे। रविवार का एक दिन था।                        

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