उड़ता हिमाचल

भाग-1

स्वर्ग जैसा हिमाचल अब नशे में गर्क होता जा रहा है। पहाड़ की जवानी धीरे-धीरे नशे में इतनी मदहोश हो गई है कि जान की भी परवाह नहीं। आए दिन नशे से मौत की खबरें मिल रही हैं। कहीं चरस तो कहीं शराब। चिट्टा तो युवा पीढ़ी की नस-नस में घुलता जा रहा है। यूं कहें कि हिमाचल अब नशे में उड़ रहा है, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं हागी…

शिमला  – हिमाचल में हर वर्ष पांच हजार लोग नशे की गिरफ्त में आने से अस्पतालों में भर्ती हो रहे हैं। इनमें से सबसे ज्यादा 14 से 40 वर्ष की उम्र के हैं, जिनकी रगों में अब खून के बजाय नशा दौड़ रहा है। मेडिकल कालेजों सहित जिला अस्पतालों में ये केस दर्ज किए जा रहे हैं। सबसे ज्यदा शराब के नशे से प्रभावित अस्पतालों में आते हैं। दूसरा नंबर अफीम, गांजा का है। तीसरा नंबर अब चिट्टा, हेरोइन का दर्ज किया जा रहा है, वहीं चौथा नंबर इंजेक्शन से नशा करने वाले प्रभावितों का रिकार्ड है। बाकी प्रभावितों में प्रदेश में कोकीन के प्रभावित भी अस्पतालों में भर्ती किए जाते हैं। डाक्टरों का कहना है कि अस्पतालों में नशा छुड़वाने के लिए कुल मरीजों में 40 फीसदी मरीज ही अस्पताल आते हैं, वहीं बाकी वह मरीज अस्पताल आ रहे हैं, जिनकी सेहत बिगड़ी हुई है और उन्हें अस्पताल रैफर किया गया है। सबसे ज्यादा खुद नशा छुड़वाने में शराब और अफीम का सेवन करने वाले अस्पतालों में भर्ती देखे जा रहे हैं। उधर, नशा निवारण केंद्रों पर गौर करें तो प्रदेश के सभी जिलों में नशा निवारण केंद्र नहीं खुल पाए हैं। प्रदेश में मात्र सरकारी तौर पर आईजीएमसी में ही नशा निवारण केंद्र खुल पाया है। गैर सरकारी संगठनों द्वारा पांवटा सहिब, धामी, शिमला और कुल्लू में कें द्र खुल पाए हैं। प्रदेश सरकार के बार-बार घोषणा करने के बावजूद भी सभी जिलों में ये केंद्र मात्र फाइलों में ही दफन हो कर रह गए हैं। जानकारी के मुताबिक सभी जिलों में ड्रग डी-एडिक्शन सेंटर खोले जाने क ी योजना तो तैयार की गई, लेकिन कई वर्षों से योजना अभी तक सिरे नहीं चढ़ पाई है। इसके लिए प्रदेश महिला आयोग ने सरकार को पत्र भी लिखा था। इसमें साफ किया गया है कि यदि ये केंद्र नहीं खोले गए तो राज्य में नशेडि़यों का ग्राफ बढ़ जाएगा।

आईजीएसमी शिमला पहुंच रहे प्रभावित

प्रदेश के कोने-कोने से नशा छुड़वाने के लिए प्रभावित आईजीएमसी पहुंच रहे हैं। प्रति माह दो सौ लोग अस्पताल आ रहे हैं। मनोरोग विभाग के पास काम का पहले ही काफी दबाव रहता है। उसके साथ ही नशा छुड़वाने आए प्रभावितों का इलाज भी किया जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि जिला अस्पतालों में नशा निवारण केंद्र खोले जाते हैं, तो उससे प्रभावित को नशे से दूर किया जा सकता है और टूट रहे परिवारों को बचाया जा सकता है।

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