उपचुनाव की धर्मशाला

यह उपचुनाव पुनः अपने धु्रव पर योजना-परियोजनाओं की एकाग्रता का सफर देख रहा है। धर्मशाला उपचुनाव की हैसियत केवल एक सीट पाने की मोहलत नहीं, बल्कि कांगड़ा में सियासत का घर बसाने की कवायद भी है। इसलिए संसदीय चुनाव में अपार सफलता ने सोचने-समझने और पाने के राजनीतिक समीकरण बदले हैं, तो अब उपचुनाव का साहस कुलांचे मारेगा। परिस्थितियां फिर करीने से परखी जाएंगी और सत्ता के संतुलन की दिवाली इस उपचुनाव के दीए में घी डालकर देखेगी कि क्या परिणाम निकाला जाए। यह कांग्रेस के लिए भी अपने मनोबल को बनाए रखने की परीक्षा है, क्योंकि पिछले विधानसभा हार के कारणों में पार्टी जितना स्वयं थी, उससे कहीं कम भाजपा अपनी जीत में थी। तब चुनावी अनार ने अगर कांग्रेस के भीतर सौ बीमार किए थे, तो कमोबेश अब किशन कपूर का उत्तराधिकार पाने का घर्षण भाजपा के भीतर दिखाई दे रहा है। लिहाजा यह उपचुनाव पार्टियों के भीतर अनुशासन की बागडोर देखेगा, तो उस इतिहास पर निगाह भी डालेगा जो राजनीति में नायक को खो चुका है। धर्मशाला का ग्राफ सियासी संकीर्णता व संघर्ष का चित्र पेश करता है, तो सियासत का ऐसा मोहरा भी रहा, जो कभी जीता – कभी बुरी तरह हारा। कमोबेश हर विधानसभा के राजनीतिक इतिहास में नेतृत्व के अभिशप्त अध्यायों की सजा मिलती रही है। धर्मशाला में जीत कर कुछ नेताओं ने क्षेत्र को बार-बार हराया और कुछ इसी तरह के प्रश्नों के बीच आगामी उपचुनाव होगा। यह वर्तमान सरकार के डेढ़ साल के डिलीवरी सिस्टम व शैली की समीक्षा सरीखा इसलिए भी माना जाएगा, क्योंकि शिमला के बाद सत्ता का एहसास यहां की आबोहवा में घुल मिल सा गया है। यह भी सही है कि वीरभद्र सिंह ने अपने मुख्यमंत्रित्व की पताका को बरकरार रखने के लिए कुछ प्रयोग किए और कुछ भविष्य की अनिवार्यता के लिए छोड़ दिए। प्रदेश की दूसरी राजधानी का दर्जा भले ही औपचारिक दिखाई दिया, लेकिन इसे या तो निगलना होगा या उगलना होगा। इसी तरह विधानसभा के तपोवन परिसर को सफेद हाथी बना देना या इसे तपते सवालों के हवाले से देखकर क्षेत्रीय संवेदना का मर्म मान लेना, पुनः समीक्षारत है। बेशक सरकार को यह श्रेय जाएगा कि केंद्रीय विश्वविद्यालय की भटकती आत्मा की मूर्त बन गई, लेकिन जमीन पर वन संरक्षण कानून की अनापत्तियां अभी नजाकत छोड़ने को राजी नहीं। इन तमाम संदर्भों का अतीत से गहरा रिश्ता  रहा है और जिसके हर कारण में राजनीतिक रोटियां सेंकने की इच्छा रही है। इन्हीं प्राथमिकताओं से निकलकर मुख्यमंत्री का शीतकालीन प्रवास शुरू हुआ, तो हिमाचल भवन भी चला, लेकिन इस स्तंभ को गिराने की हिम्मत धूमल सरकार ने दिखाई। कुछ इसी तरह के किस्से हिम्मत से जीते और हिम्मत से हारे भी, फिर भी शिमला की सत्ता को अपना दूसरा घर यहां बरकरार रखना पड़ा। बहरहाल डेढ़ साल की जयराम सरकार के पास फतह करने का मकसद बड़ा हो रहा है और इसके साथ किशन कपूर का उत्तराधिकार खड़ा हो गया है। उपचुनाव के चबूतरे पर कांग्रेस की धूप है और छांव भी। बेशक पूर्व मंत्री सुधीर शर्मा को राजनीतिक तौर पर हार मिली, लेकिन विकास का युग उन्हें आशीर्वाद दे रहा है। डेढ़ साल में ही शिमला के बाद बना धर्मशाला नगर निगम असहाय क्यों हुआ। प्रदेश की पहली स्मार्ट सिटी की मिट्टी क्यों खुर्द बुर्द हुई। क्यों आईटी पार्क के झंडे उतर गए या प्रदेश के पहले ट्यूलिप पार्क के फूल खिलने से पहले ही मुरझा गए। हारा तो गगल एयरपोर्ट भी। सबसे ज्यादा पर्यटकों को बुलाकर भी एयरपोर्ट के विस्तार की फाइल पर धूल क्यों चढ़ गई और अचानक मकलोडगंज से जुड़ते रज्जु मार्ग की रस्सियां ठंडी पड़ गईं। देखना यह होगा कि धर्मशाला उपचुनाव किशन कपूर की विरासत को अपनाता है या तिलांजलि देता है। यह विकास की गागर में पर्ची निकालने या विजन के धरातल पर संभावना तलाशने का मकसद हो सकता है। जनता अपने वजूद में विकास यात्रा के सामूहिक चिन्ह देखना पसंद करेगी या ठेठ सियासत की कठपुतली बनी रहेगी। यह वीरभद्र की विरासत में जयराम के चेहरे की चमक हो सकता है, क्योंकि सरकार के अपनाने और आजमाने का यक्ष प्रश्न बनकर उपचुनाव राजनीति को मालामाल करने का वशीकरण भी तो है।

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