उपलब्धियों को छीनता मंजर

हिमाचल को देखने का एक नजरिया इन दिनों उस सफलता से मुखातिब है, जो भविष्य के करियर में ढलते बच्चों को देख रहा है। इंजीनियरिंग के बाद डाक्टरी की पढ़ाई का चिट्ठा जब खुलता है, तो सीढि़यों पर बैठे अनेक हिमाचली बच्चे मुस्कराते मिलेंगे। सफलता की कहानियों के बीच कई रहस्य और प्रश्न हैं, तो अभिभावकों के संकल्प और जीवन को जीतने की उमंगें भी हैं। कुछ इसी तरह का एहसास भारतीय सैन्य अकादमी से पासआउट होते 21 हिमाचली युवाओं को गरिमामयी वर्दी में देखकर होता है। सफलता के इस मंजर में प्रदेश को यश तथा आगे बढ़ने का आदर्श मिलता है, लेकिन इसमें राज्य की भूमिका और शिक्षा की सरकारी व्यवस्था दिखाई नहीं देती। करियर बनाते हिमाचली बच्चों की पहचान आज कुछ खास निजी स्कूलों, अकादमियों या अभिभावकों के निजी प्रयास व रणनीति पर टिकी है। नजदीक से देखें तो इन सफलताओं के आसपास पलायनवादी रुख भी है, जो सरकारी ढांचे से बाहर निकल कर श्रम कर रहा है और श्रेय की कसरत में भाग्य आजमा रहा है। अगर ऐसा नहीं है तो स्कूल शिक्षा विभाग तथा बोर्ड को ऐसी सूचनाओं का प्रकाशन करना होगा कि कितने बच्चे सरकारी ढांचे से निकल कर प्रवेश या प्रतियोगी परीक्षाओं में सफल हो रहे हैं। हकीकत में तस्वीर के भीतर का अक्स इसके विपरीत सारे दावों को खारिज करके खड़ा है। करियर की दुकान अब बदल गई और इसीलिए जमा एक और दो के बीच अभिभावकों का संघर्ष बढ़ जाता है। पूरे प्रदेश के सरकारी स्कूलों से कम हो रहे छात्रों की संख्या कई तरह से पलायन कर रही है। एक वे बच्चे हैं, जो प्रदेश के बाहर निकल कर पढ़ाई के साथ-साथ इंजीनियरिंग और मेडिकल संस्थानों में प्रवेश पाने का बीड़ा उठा रहे हैं और दूसरे वे जो हिमाचल के निजी स्कूलों से जमा दो तक की पढ़ाई पूरी करके विशेष कोचिंग के लिए राज्य से बाहर निकल रहे हैं। दोनों परिस्थितियों में अगर इसे मां-बाप की भेड़चाल मान लें, तो भी यह सीधे तौरपर हिमाचली ढांचे को नकार रही है। यानी हर साल करीब पंद्रह हजार बच्चे उन गलियों की धूल फांकते हैं, जहां करियर पाने की कोशिश में कई वजूद नीलाम हो रहे हैं। बेशक कुछ छात्र सफल हो पाते हैं, लेकिन लौटते काफिलों में छाई मायूसी को जानें तो विचित्र तनाव के बीच समाज खड़ा है। क्या बच्चों के असफल होते ख्वाब की कोई जिरह या वजह नहीं होगी या इस परिस्थिति से निकलने की कोई आशा ही नहीं बची। जो भी हो, इस दौर की विडंबनाओं के बीच शिक्षा की गुणवत्ता हासिल करने की चुनौती बढ़ जाती है। हमें स्वीकार करना पड़ेगा कि करियर बनाने में हिमाचल शिक्षा को अपने आधार पर खिसकने से बचाना है, अलबत्ता अभिभावकों के पास केवल बाजार से खरीदने का विकल्प ही बचा है। बाहरी राज्यों में स्थापित दर्जनों संस्थान इस तरह सपनों के महल हैं और चंद सफलताओं के सिक्के उछालकर मायाजाल फेंका जा रहा है। ऐसे में हिमाचल का गौरवान्वित चेहरा यह भूल जाता है कि सफलता के मानदंड आयातित सौदेबाजी है और यह अभिभावकों की मेहनत की बख्शीश बनकर दर्ज है। सेना के शौर्य में नई पंक्ति जोड़कर हिमाचल फख्र करता है, लेकिन इन बच्चों के भविष्य में सरकारी शिक्षण संस्थानों के योगदान की शून्यता भी सामने आती हैं। भारतीय सैन्य अकादमी से निकले 21 हिमाचली अफसरों ने निजी, आर्मी या सैनिक स्कूलों से ही शुरुआत की है। ऐसे में प्रदेश के नीति नियंता आंकड़ों पर गौर करें कि ऐसी उपलब्धियों के पीछे अभिभावकों ने किस तरह सफलता का रंग जमाया। क्या कुछ आदर्श विद्यालयों, गुणवत्ता आधारित पाठ्यक्रमों व अध्यापन के हाईटेक अंदाज से हिमाचल का शिक्षा विभाग अपने औचित्य पर गर्व नहीं कर सकता। केरल ने सरकारी शिक्षा परिसर को प्रतिस्पर्धी व माकूल गुणवत्ता आधारित किया, तो छात्र वापस लौट आए। हिमाचल स्कूल शिक्षा बोर्ड अगर चाहे, तो टेलेंट हंट करके टॉप पांच हजार बच्चों को जमा एक से ही विभिन्न प्रतिष्ठित प्रोफेशनल कालेजों की प्रवेश परीक्षा की तैयारी के लिए अपनी कम से कम आधा दर्जन अकादमी स्कूलों का संचालन कर सकता है।

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