एकत्रित कूड़े का संवर्द्धन जरूरी

सतपाल

सीनियर रिसर्च फेलो, अर्थशास्त्र विभाग, एचपीयू

 

अब समस्या कूड़े के एकत्रीकरण से कूड़े के संवर्द्धन पर आ गई है, जो कि कूड़े के एकत्रीकरण से ज्यादा गंभीर है। जहां तक कूड़े के एकत्रीकरण की बात है, उसके लिए लोगों को जागरूक करने से काम चल सकता है, जबकि कूड़े के संवर्द्धन के लिए लोगों को जागरूक ही नहीं, बल्कि तकनीकी रूप से तैयार करना पड़ता है…

हिमाचल प्रदेश पश्चिमी हिमालय में बसा एक सुंदर पहाड़ी प्रदेश है। प्रकृति ने इसे अपार सौंदर्य से अलंकृत किया है। जैव विविधता के लिए भी यह विश्वभर में प्रसिद्ध है। यह प्रदेश विभिन्न प्रकार के पेड़-पौधों, जीव-जंतुओं की जैव विविधता से परिपूर्ण है, जिसको आज हम समझना तो दूर पहचान भी नहीं पा रहे हैं।  आज हम पर्यावरण संरक्षण के महत्त्व को तो समझ चुके हैं, परंतु पारिस्थितिकी तंत्र को पहचानना व समझना भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है। प्रकृति व पर्यावरण में पेड़-पौधों के साथ-साथ जीव-जंतुओं की भी अपनी अनूठी महत्ता है। अतः पर्यावरण संतुलन के लिए न केवल जैव विविधता को बचाना महत्त्वपूर्ण है, बल्कि पारिस्थितिकी तंत्र को बचाने के भी हरसंभव प्रयास करने होंगे। हिमाचल प्रदेश विश्व में अपने स्वच्छ वातावरण व वातावरण को संरक्षित करने के लिए जाना जाता है। प्लास्टिक पर प्रतिबंध, धूम्रपान पर रोक हो या स्वच्छ भारत अभियान के प्रति बढ़ते कदम जहां एक ओर पर्यावरण संरक्षण में प्रदेश की पुरजोर कोशिश हैं, वहीं जंगलों की आग की बढ़ती घटनाएं, जगह-जगह कूड़ा-कर्कट के लगते ढेर, पीने के लिए स्वच्छ पानी की उपलब्धता में कमी व बढ़ता प्रदूषण उस कोशिश को धीमा कर देता है।

पर्यावरण प्रदूषण प्रदेश में भी देखने को मिल रहा है। बढ़ते प्रदूषण की वजह से प्रदेश में लाखों लोग श्वास से संबंधित रोगों की चपेट में हैं और यह संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है, जो चिंता का विषय है। इसके लिए पर्यावरण के साथ हो रही छेड़खानी के लिए हम स्वयं जिम्मेदार हैं। मनुष्य हर प्रकार की जरूरतों के लिए प्रकृति पर आश्रित है। फिर भी प्रकृति के साथ छेड़खानी करने से पीछे नहीं हटता। पारिस्थितिकी तंत्र के बारे में जानते हुए भी विकास व समृद्धि पाने के लिए अपने पर्यावरण तक को नष्ट करने पर तुला हुआ है। पर्यावरण संरक्षण से अभिप्राय स्थलमंडल, जलमंडल व वायुमंडल के संरक्षण से है। वर्तमान में हम पर्यावरण संरक्षण के अर्थ को तो समझ पाए हैं, परंतु इसके लिए क्या करना उचित होगा अथवा पर्यावरण संरक्षण के लिए कौन-कौन से कदम उठाने हैं, साथ ही साथ वे कदम पर्यावरण संरक्षण के लिए कितने सार्थक हैं, इस बात को समझ पाने में हम असमर्थ हैं। इसका जीता-जागता उदाहरण ‘स्वच्छ भारत मिशन’ ही है। इस मिशन से लोग स्वच्छता के प्रति जागरूक तो हुए हैं, परंतु स्वच्छता कैसे की जाए, ऐसा समझने में विफल हैं। आज लोग कूड़े के लिए कूड़ेदान का प्रयोग कर रहे हैं, जो अपने आप में एक बहुत बड़ी बात है, परंतु कूड़ेदान में एकत्रित किए गए कूड़े के साथ क्या किया जाता है, यह चिंता का विषय है। आज जगह-जगह कूड़ेदान लगे हुए भी दिखते हैं। इन कूड़ेदानों से एकत्रित कूड़ा या तो जलाया जाता है या कहीं नदी के किनारे व नाले में फेंक दिया जाता है, जो पर्यावरण के लिहाज से कदापि उचित नहीं समझा जा सकता है। एकत्रित कूड़े को जलाने से विभिन्न प्रकार की गैसों का उत्सर्जन होता है, जिससे हमारा वायुमंडल दूषित हो रहा है और श्वास से संबंधित तरह-तरह की बीमारियों का कारण बनता जा रहा है। बात यहीं आकर नहीं रुकती है, धुएं से ग्लोबल वार्मिंग की समस्या भी बढ़ जाती है। यदि उसी कूड़े को नदी-नाले में फेंक दिया जाता है, तो यह जल स्रोतों में मिलकर हमारे जीवन में अनेक बीमारियां पैदा करता है। विभिन्न शोधों से भी यह सिद्ध हुआ है कि एक मनुष्य के जीवन में 70 प्रतिशत बीमारियां पीने के दूषित जल के कारण होती हैं। अतः नीतिकारों के सामने एक चुनौती है, जिन्होंने कूड़े को एकत्रित करने में तो स्वच्छ भारत मिशन के तहत महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की है, परंतु एकत्रित कूड़े को नदी-नालों में फेंकने से समस्या समाधान के बजाय गंभीर होती जा रही है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए पर्यावरण दिवस के दिन कुदरत की रखवाली के लिए प्रदेश में ‘नॉन रिसाइकलेबल पोलिथीन योजना’ का आह्वान किया गया। साथ ही साथ दूषित जल प्रबंधन के लिए ‘वाटर प्यूरीफिकेशन इन्विगोरेटिव योजना’ का भी शुभारंभ किया, जिसके तहत दूषित जल को पीने योग्य बनाया जाएगा, जो कि इस ओर  सराहनीय प्रयास है। जहां तक हिमाचल प्रदेश की बात है तो ‘स्वच्छ भारत मिशन’ एक ब्रांड के रूप में काम करने में सक्षम हुआ है।

स्वच्छ भारत मिशन का एक अन्य महत्त्वपूर्ण उद्देश्य पूरे देश को खुले में शौचमुक्त करने का है, जिसके लिए प्रदेश निरंतर प्रयासरत है। प्रदेश का जिला मंडी, जिसको राष्ट्रीय स्तर पर स्वच्छता के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने के लिए सम्मानित किया गया। यह प्रदेश की स्वच्छता के प्रति वचनबद्धता को उजागर करता है, परंतु अब समस्या कूड़े के एकत्रीकरण से कूड़े के संवर्द्धन पर आ गई है, जो कि कूड़े के एकत्रीकरण से ज्यादा गंभीर है। जहां तक कूड़े के एकत्रीकरण की बात है, उसके लिए लोगों को जागरूक करने से काम चल सकता है, जबकि कूड़े के संवर्द्धन के लिए लोगों को जागरूक ही नहीं, बल्कि तकनीकी रूप से तैयार करना पड़ता है, जो काफी मुश्किल कार्य है, परंतु नामुमकिन नहीं। कूड़े का एकत्रीकरण तो जन-जन की सहभागिता से मुमकिन है, परंतु कूड़े के संवर्द्धन के लिए भीड़ नहीं, अपितु तकनीकी तथा निपुण लोगों की कवायद है, जिससे कूड़े के एकत्रीकरण को संवर्द्धित करने में सहयोग मिल सकता है।

ऐसा करने से ही स्वच्छ भारत मिशन की सार्थकता को समझा जा सकता है। इसका सीधा असर हमारे पर्यावरण पर अवश्य पड़ेगा। इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति का होना बहुत महत्त्वपूर्ण है। साथ ही साथ जरूरत है एक ऐसी सोच की, जो स्वार्थी न होकर प्रदेश व प्रदेशवासियों तथा अपने पर्यावरण के लिए आगे आकर लड़ने की हिम्मत रखती हो। यदि पर्यावरण को बचाना है तथा सतत विकास के नारे को सार्थक बनाना है, तो शीघ्र अति शीघ्र हमें अपना ध्यान कूड़े के एकत्रीकरण से कूड़े के उचित संवर्द्धन की ओर लाना होगा। साथ ही साथ इसके लिए गंभीरता से सोचने की भी जरूरत है, ताकि आने वाली पीढ़ी एक बेहतर पर्यावरण में रह सके।

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