ऐतिहासिक है बैजनाथ का निर्जला एकादशी त्योहार

निर्जला एकादशी का पर्व बैजनाथ एवं आसपास के क्षेत्र में प्रसिद्ध है। इस पर्व से 3-4 दिन पहले लोग बैजनाथ से 10 किमी. दूर दयोल गांव की पहाडि़यों में स्थित तत्वाणी नामक जगह पर गर्म पानी के चश्मों में स्नान करके महाकाल मंदिर के पास लगने वाले मेले में शिरकत करते हैं। जगह-जगह मीठे जल की छबीलें लगाकर आने-जाने वाले लोगों का निर्जला एकादशी वाले दिन स्थानीय नागरिकों द्वारा स्वागत किया जाता है। बैजनाथ की पुण्य धरती पर शिक्षा का अलख जगाने वाले सनातन धर्म सभा के संस्थापक स्वामी तारानंद जी की भी समाधि है। माना जाता है कि उनका जन्म और मृत्यु भी निर्जला एकादशी वाले दिन हुई थी। आगे चलकर उनके शिष्य पंडित अमरनाथ शर्मा ने सनातन धर्म सभा का प्रचार किया। आजादी के बाद बैजनाथ में ठहरने की व्यवस्था नहीं थी, तब  रायबहादुर जोधामल द्वारा प्राचीन शिव मंदिर के सामने बनवाई गई सराय का उद्घाटन भी एकादशी वाले दिन ही 1955 में जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरि सिंह की धर्मपत्नी महारानी तारारानी के कर कमलों से हुआ था। निर्जला एकादशी का त्योहार बैजनाथ स्थित गुरुद्वारा साहिब डेरा संता दा में 1947 के बाद से ही मनाया जा रहा है। यहां नौशेरा मझा सिंह, बटाला से संबंधित नीलधारी संप्रदाय के प्रवर्तक सरदार हरनाम सिंह किले वाले गुरुजी महाराज ने इस त्योहार को मनाने की शुरुआत की थी, जिसे संत हरचरण सिंह जी ने आगे बढ़ाया। इन दिनों गुरुद्वारा साहिब में गुरुग्रंथ साहबजी का अखंड पाठ और गुरबाणी कीर्तन चलता है और लंगर की व्यवस्था रहती है। तीन दिन तक मनाए जाने वाले एकादशी त्योहार में बड़ी संख्या में पंजाब और हिमाचल से सिख श्रद्धालु इस गुरुद्वारा साहिब में आते हैं। निर्जला एकादशी वाले दिन गुरुद्वारा डेरा संता दा साहिब में रौनक एवं उल्लासमय वातावरण देखते ही बनता है। जहां तक निर्जला एकादशी त्योहार के महात्म्य का सवाल है, तो हिंदू धर्म के शास्त्रों में वर्णित तथा निर्धारित व्रत और अनुष्ठानों का अपना ही वैज्ञानिक महत्त्व है। हमारे मनीषियों और विद्वानों ने अपने प्रवचनों में जल तथा वायु के महत्त्व को प्रतिपादित करते हुए इन्हें व्रत उपवास से भी जोड़ा है, जो व्यक्ति इस दिन स्वयं निर्जल रहकर शुद्ध पानी से भरा घड़ा दान करता है, तो उसे दानपुण्य का कई गुना फल मिलता है।

 – अनुज कुमार आचार्य, बैजनाथ

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