ऐसा क्यों होता है सर?

अशोक गौतम

साहित्यकार

व्यवस्था में बचे गिने-चुने तमाम कुत्तों को ज्यों ही सरकार के इस विश्वासघाती, पक्षपातपूर्ण बजट ठिकाने लगाऊ कैबिनेट फैसले का पता चला कि सरकार सिर पर छत न होने के चलते आवारा डिक्लेअर वफादार कुत्तों को पकड़ने के लिए गुपचाप तरीके से खतरनाक अभियान चला रही है, तो शहर के ईमानदारों की थालियों को ताकते भूखे कुत्तों तक में हाहाकार मच गया। सो हर बार की तरह अबकी फिर बिन तैयारी के  तूफानी इरादे से शहर की खास जनता को ईमानदार कुत्तों के आतंक से बचाने के सरकार ने आनन-फानन में कुत्ता पकड़ दस्ते का गठन किया। उसमें हर विभाग के वेतन के सिवाय कुछ भी न पकड़ने वाले अपने तथाकथित चुनिंदा कुत्ता पकड़ महानिक्कमे माहिर दोगुने डेपुटेशन भत्ते पर शामिल किए गए। महानिक्कमे माहिर भी ऐसे-ऐसे कि वे आकाश में उड़ते जहाज की गर्दन कागजों ही कागजों में पलक झपकने से पहले ही जकड़ लें। कुत्तों को पकड़ने के लिए कुत्ता पकड़ दस्ते का निर्माण होते ही सरकार ने चैन की सांस ली। उसे लगा कि कम से कम अब आम जनता के नाम पर वीवीआईपियों को तो कुत्तों से बचाया ही जा सकता है। कुत्ते पकड़ने के सिलसिले में वे चाकचौबंद हो हमारे मोहल्ले के कुत्तों को भी पकड़ने आए, तो मोहल्ले के कुत्तों के साथ ही साथ हमारे वर्ग के तथाकथित कुत्तों में भी हलचल होनी शुरू हो गई। हर जगह बस एक ही सवाल- कुत्तों के बहाने पता नहीं ये कुत्तों को पकड़ने वाले, कुत्तों को छोड़ और किस-किसको पकड़ कर ले जाएं। इसी डर से मोहल्ले के कई तथाकथित बड़े तो कुछ दिन तक घर से बाहर ही नहीं निकले।  तो वे सरकारी आदेश पा अपनी दुम छिपाए, दबाए उस कुत्ते के पीछे उसे पकड़ने को हाथ-मुंह धोकर पड़े थे। वे चाहते थे कि जिंदगीभर तो काम के बदले नोटों के सिवाय और कुछ न पकड़ सके, चलो अब पाक-साफ नौकरी के नाम पर एक वफादार बेसहारा कुत्ता ही पकड़ अपनी सरकारी नौकरी को जस्टिफाई कर लिया जाए। वे कुत्ते के पीछे जितना उसे पकड़ने को दौड़ते, कुत्ता उनसे उतना ही दूर भाग जाता। पता नहीं कुत्ता कुत्ता होते हुए भी कुत्ते से क्यों डर रहा था। उन्होंने कुत्ते को पकड़ने के लिए उसे जितने प्रलोभन दिए, कुत्ता प्रलोभनों से उतना ही दूर रहा। कोई आदमी होता, तो जाल में फंसते देर न लगती। विशुद्ध वफादारों के साथ बस यही एक मुश्किल होती है। वे प्रलोभन के बाद भी हत्थे नहीं आते। जब वे कुत्ते को पकड़ते-पकड़ते थक गए, तो उन्होंने कुत्ते के आगे हाथ जोड़ते कहा- अब तो पकड़ में आ जा मेरे बाप। तो कुत्ता उन्हें पकड़ने को ललचाता मुस्कराता बोला- देखो सर! आवारा ही सही, पर हमने वफादारी अभी भी नहीं छोड़ी है। हम आदमी नहीं, जो प्रलोभन के आगे घुटने ही क्या, अपने को पूरा टेक दें। प्यार से चाहे कोई हमारी खाल उतार ले, तो हंस के आदमी की ईमानदारी की तरह उसे उतार कर रख दें। हमें पकड़ने से कुछ भी भला नहीं होने वाला। पकड़ना है, तो भ्रष्टाचार को पकड़ो। पकड़ना है, तो नंबर दो के पंजीकृत ईमानदारों को पकड़ो। शहर में नाचने वाले नकली मोर को पकड़ो। समाज का हित चाहते हो, तो पुलिस के मिले चोर को पकड़ो। उसने सीना चौड़ा कर कहा, तो वे खिसिया कर रह गए। यार! मेरी नाक का सवाल है। समाज के गीदड़ों, सियारों के साथ तो आज तक मैं रेव पार्टियां करता रहा, पर तू तो आज मेरी नाक बचा दे। खाली हाथ गया, तो सरकार को क्या मुंह दिखाऊंगा कि मैं एक कुत्ता भी नहीं पकड़ सका। उन्होंने वैसे ही कुत्ते के आगे हाथ जोड़े, जैसे वह साहब के आगे हरदम जोड़े रहते थे। देखो सर! बुरा मत मानना और कुत्ता उल्टे उन्हें पकड़ने उनके पीछे दौड़ने को हुआ, तो वह सिर पर पांव रख ये भागे कि…। सर ! एक बात तो बताना प्लीज! व्यवस्था चोर पकड़ने निकलती है, तो चोर उसे क्यों पकड़ लेता है? व्यवस्था भ्रष्टाचार को पकड़ने निकलती है, तो वह व्यवस्था को जकड़ क्यों लेता है?

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