ओपी शर्मा का साहित्य किसी दायरे में नहीं बंधता

मेरी किताब के अंश :

सीधे लेखक से

किस्त : 16

ऐसे समय में जबकि अखबारों में साहित्य के दर्शन सिमटते जा रहे हैं, ‘दिव्य हिमाचल’ ने साहित्यिक सरोकार के लिए एक नई सीरीज शुरू की है। लेखक क्यों रचना करता है, उसकी मूल भावना क्या रहती है, संवेदना की गागर में उसका सागर क्या है, साहित्य में उसका योगदान तथा अनुभव क्या हैं, इन्हीं विषयों पर राय व्यक्त करते लेखक से रू-ब-रू होने का मौका यह सीरीज उपलब्ध करवाएगी। सीरीज की 16वीं किस्त में पेश है लेखक डा. ओपी शर्मा का लेखकीय संसार…

पुस्तक ‘देवभूमि हिमाचल’ के रचयिता डा. ओपी शर्मा का कहना है कि साहित्य समाज का दर्पण है। सद साहित्य वही है जो समाज के अवगुणों को अर्थवत्ता देता है। देवभूमि हिमाचल की देन, मंदिरों व इनसे संबंधित कथाओं का वर्णन देव स्थलों का एक सच प्रकाशित संकलन है। ये सभी जन श्रुतियों पर आधारित संकलन मेरे जीवनानुभवों की बहुमुखी भाव छवियां हैं। इसमें मैंने समग्र सामाजिक आस्था व सरोकारों को संकलित करने का प्रयास किया है।

कई देव स्थलों की पुरातन कला, निर्माण विधा व चित्रकारी का सुंदर वर्णन कर इन स्थलों की विविधता को जगजाहिर किया है, जो पर्यटकों व शोधकर्ताओं के लिए आकर्षण बन सकता है। धर्मस्थलों की वास्तविक उपस्थिति पर संक्षिप्त परंतु बहुमूल्य जानकारी पर प्रकाश डाला है, जो प्रशासन के लिए मार्गदर्शन का कार्य करता है और अधिकारियों को आवश्यक सुधार करने के लिए प्रेरित करता है। मैंने 64 धर्मस्थलों का बेहतरीन ढंग से चित्रण पेश कर अपनी नुमाइंदगी की है, जिसमें देव, देवता, देवियां, भगवान शिव, बाबा बड़भाग सिंह, पांवटा साहिब गुरुद्वारा तथा अन्य पूजा स्थलों का विवरण देकर रचना द्वारा ज्ञान भंडार प्रचार करने का प्रयास किया है। समाज में प्रचलित परंपराएं, लोक संस्कृति, धार्मिक आस्था व श्रद्धा मानव को जीवन में परिश्रम व प्रेरणा से आगे बढ़ने की शिक्षा व साहस देते हैं। अतीत से निरंतर चली आ रही मान्यताएं आज भी परस्पर सद्भाव, प्रेम व आदर को बढ़ावा और राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करती हैं। मैंने धार्मिक स्थलों के लगभग सभी विवेचनीय प्रसंगों का विवरण इस पुस्तक में शामिल किया है। एक ओर देव स्थलों का इतिहास, लोक कथाओं का वर्णन किया है, उसके साथ इन देवों की साधना मानव की सुख-शांति के लिए जरूरी बताई गई है। मानव सुख-दुख में देवी-देवताओं की आराधना करे तो सभी दुख दूर हो जाते हैं। ऐसा संदेश देकर मैंने पाठकों के हृदय को छूने की कोशिश की है। कहा भी गया है कि : दुख में सुमिरन सब करे,  सुख में करे न कोय, सुख में सुमिरन जो करे तो दुख काहे को होए। ये पूजा स्थल वृद्ध पुरुषों, महिलाओं को तो सुख-शांति देते ही हैं, बच्चों को लोक संस्कृति व आस्था का ज्ञान भी देते हैं। आज लेखक अपने-अपने ढंग से साहित्य लिखने का प्रयास कर रहा है। मैं कई सालों से साहित्य लिख रहा हूं। आलोच्य पुस्तक में प्रदेश के मंदिर, देवस्थलों, विभिन्न क्षेत्रों की प्रचलित लोक संस्कृति, मान्यताओं को उजागर किया गया है। लोक संस्कृति, मेले, त्योहार आदि अध्यापकों, पाठकों व छात्रों के लिए लाभदायक सामग्री है। इसी तरह ‘वीरभूमि’  मेरा पहला कविता संग्रह है, परंतु मेरी रचना पहाड़ी व हिंदी की ख्याति प्राप्त साहित्यिक रचनाएं होती हैं, जो विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं। ये कविताएं वर्तमान परिदृश्य से ही उपजी हैं, लेकिन सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे आज के काव्य परिदृश्य के दायरे में नहीं बंधती, वे उसे तोड़ती हैं और कविता का नया संसार बनाती हैं। कविताओं में शाश्वत मूल्य उद्घाटित होते हैं। इनमें वन परिचय है, भक्ति से लबालब है, भौगोलिक स्थिति की जानकारी है। नदियों व गांवों की सच्चाई है, देशभक्ति है, किसानों, मजदूरों व युवाओं की प्रेरणा है, लोक संस्कृति व साक्षरता आदि विषयों पर पैनी नजर है। हालांकि साहित्य कला की कुछ कमी जरूर खलती है, परंतु ऐसा अधिकतर पहाड़ी काव्य में देखने को मिलता है और भविष्य में इसमें सुधार भी अवश्य होता है। भाषा साफ व सटीक है और इसे हर कोई आसानी से समझ सकता है।

इस कविता संग्रह से राष्ट्रीय एकता का संदेश भी मिलता है। मेरा पूरा जीवन साहित्य के प्रति समर्पित रहा है। मेरा जन्म ग्राम समहूं, डाकघर दंगड़ी, तहसील नादौन, जिला हमीरपुर, हिमाचल प्रदेश में 08 दिसंबर, 1944 को हुआ। मैंने एमए, एमएड, पीएचडी (शिक्षा) परीक्षा पद्धति, पत्रकारिता, युवा कार्य में डिप्लोमा प्राप्त कर अपनी शिक्षा को पूरा किया। मैंने तकनीकी शिक्षा विभाग में 17 वर्ष अध्यापन किया। इसके अलावा युवा कार्य एवं खेल मंत्रालय में नेहरू युवा केंद्र जिला समन्वयक शिमला, मंडी, कांगड़ा, चंबा, सोलन, किन्नौर, हमीरपुर व बिलासपुर एवं बिहार-झारखंड राज्यों के मंडल निदेशक के पद पर 19 वर्ष वरिष्ठ सेवा कर मैं सेवानिवृत्त हुआ। मैंने वर्ष 1969 से लिखना प्रारंभ किया। आकाशवाणी शिमला, धर्मशाला, हमीरपुर, जालंधर व दूरदर्शन जालंधर से कवि सम्मेलन, वार्ता व रूपक में भाग लिया। भाषा विभाग की साहित्यिक गोष्ठियों व कार्यक्रमों में भी भाग लिया। बिपाशा, हिम भारती, पंचजगत, गिरिराज, शैल, फ्रंटियर मेल, ऊंचा हिमालय, आइरा, हमारा घर, हिम शिक्षा, युवा दर्शन, पंजाब केसरी, हिम भाषा, पर्वत की गूंज, वीर आनंद, जनसत्ता, हिम किसान आदि समाचार पत्रों व पत्रिकाओं में आलेख व रचनाएं चालीस वर्षों से प्रकाशित होते रहे हैं। आज पहाड़ी भाषा में अच्छे लेखकों का उदय हो रहा है। इस कड़ी में मेरा काव्य संग्रह ‘वीरभूमि’ एक अच्छा प्रयास है। हालांकि पहाड़ी भाषा, जो कांगड़ा, चंबा, हमीरपुर, ऊना, मंडी व बिलासपुर के भागों में बोली जाती है, में साहित्य की रचना प्राचीनकाल से ही हो रही है तथा वर्तमान हिमाचल प्रदेश की भूतपूर्व रियासतों में टांकरी लिपि में अनेक ताम्र पत्र आदि उपलब्ध हैं जो पहाड़ी भाषा संबंधी इतिहास की धरोहर हैं, तथापि इस भाषा में पुस्तक प्रकाशन का क्रम हिमाचल कला, संस्कृति और भाषा अकादमी तथा भाषा एवं संस्कृति विभाग की स्थापना के बाद आरंभ हुआ। मैंने ‘दशम बादशाह’ में जहां सिख धर्म में कुर्बानी की मिसाल देते हुए लिखा कि सरहिंद में जब गुरु गोबिंद सिंह जी के सबसे छोटे साहबजादे को दीवारों में चिनवाया गया तो उसमें बड़े साहबजादे ने यूं कहा : ‘पर तैं तो पहला आया जग बिच। पहलां खांण ते पीण लगा। धर्म दी बाजी जित के अब। तू मैं तो पहला जाण लगा।’ यह मन को छू जाता है। इनमें एकांत में चुपचाप मनन करने के स्थान पर वास्तविकता का पीछा करने की बात है। यही मेरी रचनात्मकता है। आशा है कि पाठकों को ऐसी अच्छी किताबें भविष्य में भी मिलती रहेंगी और उन्हें प्रेरणा मिलेगी।

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