कंदराओं का कौशल

भारत भूषण ‘शून्य’, स्वतंत्र लेखक

वक्त के आईने में बदलाव देखकर खुश होना स्वाभाविक है, लेकिन वक्त जब अपना आईना बदलने की जुगत बिठा लेता है तो हमें लगने लगता है पैरों तले की धरती खिसक गई। समाज के भीतरी टकराव को जब खुले आसमान तक बिखेर देने का खिलवाड़ होता है तो हम भयभीत होने को जिंदगी का सच मान लेते हैं। यह भय हमारे भविष्य को संशय के उस कालखंड में ला पटकता है जहां किसी उजास की आस बेमानी लगने लगती है। इसी डर की जमीं पर ऐसा नेतृत्व उभर आता है जो हमें हमारे तुच्छ लाभ की लुभावनी बातों से बरगला सकता है। तब डर और फायदे के इस अभूतपूर्व युग्म की वह चक्की चल उठती है जो सिवाय हमें पीसने के और कुछ कर सकने में सक्षम नहीं होती। समय की चाल को अपनी कदमताल मान लेने वाले अक्सर इन्हीं पैरों के बल औंधे मुंह गिरा भी करते हैं। आदमी की खासियत यही है कि वह अपनी विडंबनाओं के समंदर का मंथन कर सकता है। उसके इनसान होने की एकमात्र विशेषता भी ‘इनसानियत’ थी, है और रहेगी। इस खूबी की इबारत को बहुत बार पौंछ डालने के यत्न कुछ सिरफिरे करते आए हैं। सच्चाई को छुपाने के लिए बहुत-सी मानसिक और सामाजिक कंदराओं का सहारा लिया जाता रहा है।  इसी को लक्ष्य बना लेने वाले बहुतेरे लोग होते रहे हैं। भूल-भलैया का यह खेल भी जारी रहता है और सत्य को अपना मुकुट बनाने वाले भी अपनी लड़ाई को निरंतर जारी रखते हैं। हम कब इस या उस पाले की तरफ हो सकते हैं, इसके प्रति जागरूकता ही हमारे उन्नयन का प्रतिमान स्थापित किया करती है। भीड़ होने के बहुत सुख और लाभ हैं, इसको तिलांजलि देने की क्षमता हमारी जीवंतता को परिभाषित करती है। मुद्दों का मुद्दा यह है कि क्या हम जागृत होने और रहने की निरंतरता को बनाए रख सकते हैं। यही एकमात्र पथ है जो सहज और सरल लगेगा जब हम अपनी ईमानदारी के लिए किसी खास पक्ष या संस्थान की बाट नहीं जोहते। अगर हमेशा दूसरे लोग हमारी इस आत्मिक आस्था के लिए जरूरी बने रहेंगे तो वक्त को अपना आईना बदलने का इंतजार हमें करना होगा। सनातन होने का तात्पर्य है, सदा अपने रूप, भीतरी स्वरूप और आयतन के प्रति जागरण।       

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