कई क्षेत्रों में मनाई जाती है माघी

माघी उत्स्व ऊपरी शिमला, गिरिपार के हाटी कबीले तथा उत्तर प्रदेश के ‘बाबर-जौंसार’ जनजातीय क्षेत्रों में मनाया जाता है। ‘उतरांदी त्योहार’  के लिए पूरे वर्ष से तैयारी होती है। लोहड़ी (उतरांटी) के दिन प्रातः लगभग नौ बजे से ही गांव के लोग इकट्ठे होकर ‘भातियोज’ अर्थात बकरे काटने शुरू कर देते हैं। यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है…

गतांक से आगे …

हाटी क्षेत्र में माघी त्योहार : इसी कड़ी में चौथे दिन का मशहूर त्योहार है ‘उतरांदी’ उस दिन सभी मांसहारी परिवारों में अपने सामर्थ्य के मुताबिक बकरे इत्यादि काटे जाते हैं। यह त्योहार ऊपरी शिमला, गिरिपार के हाटी कबीले तथा उत्तर प्रदेश के ‘बाबर-जौंसार’ जनजातीय क्षेत्रों में मनाया जाता है। इस त्योहार के लिए पूरे वर्ष से तैयारी होती है। लोहड़ी (उतरांटी) के दिन प्रातः लगभग नौ बजे से ही गांव के लोग इकट्ठे होकर ‘भातियोज’ अर्थात बकरे काटने शुरू कर देते हैं। यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है। लोहड़ी के आठवें दिन ‘8 प्रविष्टे माघ’ को ‘खोड़ा’ कहते हैं। गांव में आए मेहमानों तथा समस्त ग्रामीणों के मनोरंजन के लिए दिन में गांव के सार्वजनिक स्थल तथा रात्रि को किसी बड़े मकान में स्थानीय लोक कला (नाटी तथा रासा) का आयोजन किया जाता है। लिहाजा माघ के सारे महीने भर इस क्षेत्र के समस्त गांवों में खुशी का, मौज-मस्ती का, खाने-पीने का तथा मेहमानबाजी का आलम रहता है। निःसंदेह आधुनिक युग में इस रीति-रिवाज तथा संस्कृति को किसी भी रूप में लिया जाए, लेकिन यह पौराणिक जनजातीय कबायली संस्कृति अपने आप में अनूठी हैं तथा इसकी अपनी अलग पहचान है। बहरहाल इस क्षेत्र में इन त्योहारों की अहमियत केवल वही लोग आंक सकते हैं। जो इस विकट, पिछड़े व कबायली क्षेत्र से भावानात्मक रूप से जुड़े हों। इस क्षेत्र के लोगों में सच्चाई, सादगी, सेवाभाव तथा कड़ा परिश्रम ही इनकी दिनचर्या है। यद्यपि हाटी कबीले के नाम से जाना जाने वाला जिला सिरमौर का शिलाई तथा रेणुका का यह विकट क्षेत्र शिक्षा की दृष्टि से अब इतना पीछे नहीं रह गया है। जिस प्रथा को रोकने में बुद्धिजीवी वर्ग असफल रहा प्रदेश उच्च न्यायालय ने सितंबर, 2014 में पूर्णरूप से प्रतिबंधित कर दिया।

शिवरात्रि : फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चौदहवीं तिथि को मनाया जाने वाला शिवरात्रि का त्योहार हिमाचल प्रदेश में बहुत महत्त्व रखता है, क्योंकि शिवजी का हिमालय के पहाड़ों से सीधा संबंध माना जाता है और पौराणिक तौर पर शिवजी यहां के धार्मिक और अध्यात्मिक जीवन से जुड़े हैं। निम्न भाग के क्षेत्रों में इस दिन व्रत रखा जाता है और शिवजी की पिंडी का पूजन किया जाता है। शिवालयों में कीर्तन किए जाते हैं और शिव के भजन गाए जाते हैं। मध्य व ऊपरी भागों के क्षेत्रों में शिवरात्रि के मनाने का अपना अलग तरीका और महत्त्व है। शिवरात्रि के दिन सवेरे ही लोग उठ जाते हैं। परिवार के सभी सदस्य स्नान करते हैं। अधिकतर लोग उपवास रखते हैं।

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