कबीर तुम लौट आओ

 नरपत दान चारण

कबीर- नाम के अर्थ से भी श्रेष्ठ तथा महान हैं और कर्म से भी। अंधश्रद्धा और अंधविश्वास के विरोध में सदैव मुखर। कुरीतियों पर बाणी से प्रहार किया। बदलाव की नई इबारत लिखने लगे। बदलाव की नींव बहुत मजबूत और गहरी कर गए। कबीर चले गए, समाज रह गया। कालांतर में उनकी  बाणी और शब्द लोगों को भा गए, मगर अफसोस कि वे उनके विचारों को आत्मसात नहीं कर पाए। जिन कबीर ने मूर्तिपूजा का खंडन किया, उनका ही मंदिर बना दिया गया। उनके दोहे केवल किताबों में छपे रह गए। जरूरत थी उनके विचारों को दिल में छापने की। शायद लोग यह नहीं कर सके, तभी आज भी समाज में वही पाखंड, भेदभाव, अंधविश्वास, सांप्रदायिकता और आतंक के नंगे तांडव से सामना हो रहा है। अगर हम तनिक भी कबीर को आत्मसात कर पाते, तो आज समाज और राजनीति का आईना ही कुछ और होता।  आधुनिक मानव उपद्रव की आग भड़काने में मशगूल है। कहीं दंगे हैं और कहीं हथकंडे। कहीं गिरी हुई राजनीति का बोलबाला है। कबीर के विचारों की महक सामाजिक दुर्गंध को भेदने के लिए आज जरूरी है। जरूरत महज उनकी जयंती मनाने की नहीं, बल्कि उनके विचारों को आत्मसात करने की है।

 

 

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