कब रुकेगा सड़क हादसों का दौर

कंचन शर्मा

लेखिका, शिमला से हैं

 

गहरी घाटियों व नदियों के किनारे ऊंची पहाडि़यों को काटकर बनाए गए संकरे रास्ते, वह भी बिना पैरापिट के यही इंगित करते हैं कि पहाड़ में जीवन का कोई मोल नहीं। दुर्घटनाओं से हुए अलाप से कोई संवेदना नहीं, इन दुर्घटनाओं से निजात पाने की कोई योजना भी नहीं। बड़े दुःख की स्थिति है। प्रारंभिक अवस्था में ही हिमाचल की भौगोलिक स्थिति को बिना विचारे फोरलेन की शुरुआत के लिए हजारों पेड़ों की बलि लेने से बेहतर था, शुरू में ही टू-लेन का निर्णय लेकर नदियों और खाइयों के किनारे पूरे हिमाचल की सड़कों पर वृक्षारोपण करना व पूरी सड़क व्यवस्था को पैरापिटमय करना, ताकि रोज के इन सड़क हादसों से बचा जा सके…

अभी-अभी कुल्लू के बंजार में सड़क हादसे की खबर सुनकर दिल फिर से सहम गया। रोज की इन सड़क दुर्घटनाओं ने धीरे-धीरे हिमाचल को सड़क हादसों का प्रदेश बना दिया है। वर्ल्ड हैल्थ आर्गेनाइजेशन की रिपोर्ट के अनुसार  प्रतिवर्ष विश्व में 12 लाख लोग सड़क हादसों में मर जाते हैं। इसमें लाखों मौतें भारत में ही हो जाती हैं, जो किसी महामारी से कम नहीं। हिमाचल की बात करें तो आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में हर साढ़े तीन घंटे में एक मौत व हर 96 मिनट के बाद एक सड़क हादसा होता है, जो मन को विचलित करने वाली स्थिति है। वर्ष 2016 में 3168 सड़क हादसे सामने आए, जिसमें 1280 लोगों की जान गईर्, 6000  के लगभग  लोग घायल हुए। 2017 में लगभग 3200 सड़क दुर्घटनाओं में 1200 लोगों ने जान गंवाई और साढ़े पांच हजार के लगभग लोग घायल हुए। 2018 में भी हिमाचल का ऐसा कोई जिला नहीं, जहां सड़क दुर्घटनाओं ने मौत का तांडव नहीं रचा, जबकि नूरपुर में स्कूल बस दुर्घटना में 27 बच्चों की जिंदगी खत्म हुई, जहां एक ही घर से दो, तीन चिराग बुझे। एक ही गांव में अनेक चिताएं जलीं। भला इससे ज्यादा हृदय विदारक और क्या घटना हो सकती है।  कितनी ही माताओं के आंचल जिंदगी भर के लिए सूने हो गए।

मगर हम इस पर भी असंवेदनशील ही बने रहे, नहीं सुधरे। न सरकार की ओर से कुछ योजना, न प्रशासन से कोई निर्देश। जब भी कोई हादसा होता है, उसकी जांच के आदेश दे दिए जाते हैं, मृतकों के परिजनों को सांत्वना व मुआवजे की राशि देकर इतिश्री कर ली जाती है। जबकि सड़क हादसों से हजारों परिवार तबाह हो जाते हैं और  अपाहिज होने की स्थिति में जिंदगी की दशा व दिशा बदल जाती है। आसान नहीं होता है इन हादसों से उबरना, मगर ये हादसे केवल समाचार व कहानी बनकर रह जाते हैं। हिमाचल की दुर्गम सड़कों के किनारे जहां एक ओर नीचे आर्तनाद करती गहरी नदियां हैं व भयंकर खाइयां हैं, वहीं दूसरी ओर ऊंचे पहाड़ व सर्पीले, संकरे मार्गों पर झुकी चट्टानें व दरकती मिट्टी है। कहीं पर पैरापिट, तो कहीं साइड रेलिंग नहीं दिखती, खड्डों से भरी सड़कें अपनी खराब हालत खुद-ब-खुद बयान करती हैं।

इन भयंकर सड़कों पर हमारे प्रदेश के ड्राइवर जिस तरह वाहनों को निकालते हैं, वह स्वयं में विस्मित करता है। भिन्न-भिन्न विभागों के कार्यों के चलते सड़कों के हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। फोरलेन के तहत भी हिमाचल में सड़कों, पहाडि़यों, नदियों व खड्डों को भारी नुकसान पहुंचाया जा रहा है। भले ही हम टू-लेन तक सीमित रहने का फैसला ले चुके हैं, मगर जो नुकसान हुआ, उसकी कोई भरपाई नहीं हो सकती। अप्रशिक्षित चालक, नशे में ड्राइविंग, ड्राइविंग के दौरान मोबाइल का प्रयोग, सवारियों के चक्कर में अंधाधुंध गति, ओवरलोडिंग, रास्तों का अतिक्रमण और पैरापिट का न होना, सड़कों का मानक ग्रेड, खड्डे इत्यादि सब मिला जुला गैर जिम्मेदाराना रवैया इन सड़क दुर्घटनाओं का सबब बन रहा है। प्राकृतिक आपदाएं जैसे भू-स्खलन, भूकंप के झटके, बर्फबारी, बादल फटना, अंधाधुंध बारिश की वजह से मौत के बादल तो यूं भी मंडराए रहते हैं। इसके साथ विकास के दृष्टिगत बड़े-बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए जो भारी-भरकम मशीनरी आती है, वह भी इन सड़कों की बदहाली के लिए जिम्मेदार है। यही नहीं, शहरों की व्यस्त सड़कों पर सड़कों के अतिक्रमण व जेबरा क्रॉसिंग के न होने से पैदल चलने वाले लोग भी सड़क दुर्घटनाओं के शिकार हो जाते हैं। इन हादसों में बच्चों से बुजुर्ग, सैलानी व विदेशी पर्यटक तक शामिल हैं। हादसों की अन्य वजहों में ब्लैक स्पॉट चिन्हित न होना,  लाइसेंस इशू होने के नियम का सख्त पालन न होना, प्राइवेट बसों की मनमानियां और मैं सबसे बड़ा कारण यहां पैरापिट न होना भी मानती हूं।

गहरी घाटियों व नदियों के किनारे ऊंची पहाडि़यों को काटकर बनाए गए संकरे रास्ते, वह भी बिना पैरापिट के यही इंगित करते हैं कि पहाड़ में जीवन का कोई मोल नहीं। दुर्घटनाओं से हुए अलाप से कोई संवेदना नहीं, इन दुर्घटनाओं से निजात पाने की कोई योजना भी नहीं। बड़े दुःख की स्थिति है। प्रारंभिक अवस्था में ही हिमाचल की भौगोलिक स्थिति को बिना विचारे फोरलेन की शुरुआत के लिए हजारों पेड़ों की बलि लेने से बेहतर था, शुरू में ही टू-लेन का निर्णय लेकर नदियों और खाइयों के किनारे पूरे हिमाचल की सड़कों पर वृक्षारोपण करना व पूरी सड़क व्यवस्था को पैरापिटमय करना, ताकि रोज के इन सड़क हादसों में लील होने से बचा जा सके। वहीं दूसरी ओर हमारे देश में ड्राइवर होना व ड्राइवरी करना छोटा कार्य समझा जाता है, मगर वास्तव में ड्राइवर होना बहुत जिम्मेदारी का कार्य है और ड्राइवर के चयन का पैमाना न केवल ड्राइवरी की नजर से, अपितु उसके मानव जीवन के प्रति दृष्टिकोण के आधार पर होना चाहिए। डाक्टरों की टीम जहां एक समय में एक  ही मरीज का इलाज करती है, वहीं ड्राइवर के हाथ में एक साथ, एक समय में अनेक जिंदगियां दांव पर लगी होती हैं। वहीं वाहनों की गति का भी हिमाचल में कोई मानक नहीं, उनके काम करने के घंटे निश्चित नहीं, उनकी सुख-सुविधा भी निश्चित नहीं। प्राइवेट गाडि़यां भी नियमों को ताक पर रखकर चलाई जाती हैं।

ये सब बातें मिल कर आए दिन की दुर्घटनाओं का सबब बनती हैं। हिमाचल जैसा खूबसूरत प्रदेश विश्व के मानचित्र पर यातायात के नाम पर महफूज होना अति आवश्यक है, ताकि यहां की सुरम्य वादियां सदैव पर्यटकों को आकर्षित करती रहें व स्थानीय लोगों को महफूज रख सकें। जागना आवश्यक है, वरना ये सर्पीली सड़कें हर दिन किसी न किसी को निगलती रहेंगी।

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