कविता : पेड़ देवदार का

हर मौसम में हरा-भरा

सर्दी-गर्मी में तनकर खड़ा

देवदार का ऊंचा पेड़ यह

धरती की विषम ढलान में भी नहीं छोड़ता अपना प्राकृतिक गुण-धर्म

नहीं होता टेढ़ा-मेढ़ा

और न ही झुकना चाहता कभी भी बना कर रखे हुए अपना स्वाभिमान

ढलानदार धरती नहीं कर सकती इसे अपने निश्चित स्वरूप से विकृत और परवाह किए बिना

किसी भी संकट की

यह अदम्य साहसी पेड़

बनाए रखता है अपना संतुलन

और बढ़ता ही जाता है बेरोक-टोक

आतुर हो मानो यह

इस ऊंचे आकाश को छूने को

और यह भी इसकी असाधारण प्रकृति है कि पत्थरीली और ढलानदार धरती से ही

खींचता रहता है यह अपनी ऊर्जा

और बरकरार रखता है हमेशा

अपनी हरीतिमा का आवरण

आंधी नहीं कर सकती इसे विचलित न ही मौसम की बेरुखी कर सकती है इसे कभी भी पदच्युत

देवदार का यह पेड़

सचमुच एक साधक है

जो हर स्थिति में रहता है स्थिर

मानो कोई स्थितप्रज्ञ संन्यासी हो यह।      

– आर. वासुदेव प्रशांत,

मोबाइल नंबर 98171-87125

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