कसौली में मिले दो करोड़ साल पुराने जीवाश्म

सोलन – गिनीज बुक रिकॉर्ड होल्डर व जाने-माने जियोलॉजिस्ट डा. रितेश आर्य ने विश्व पर्यावरण दिवस पर समूचे विश्व को अनूठे तरीके से पर्यावरण का संरक्षण का संदेश दिया है। डा. आर्य ने सोलन जिला के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल कसौली के समीपवर्ती गढ़खल में दो करोड़ वर्ष पुराने जीवाश्म हासिल करने का दावा किया है। बुधवार को विश्व पर्यावरण दिवस के मौके पर गढ़खल पहुंच डा. रितेश आर्य द्वारा की गई इस खोज को काफी महत्त्वपूर्ण माना जा रहा है और इससे अन्य जियोलॉजिस्ट के चेहरे भी खिल गए हैं। वहीं, करोड़ों वर्ष पुराने इन जीवाश्मों के खजाने से कई अन्य अहम खुलासे होने की उम्मीद जग गई हैं।  बता दें कि कसौली, सुबाथू, धर्मपुर, डगशाई आदि क्षेत्रों में पहले भी जीवाश्म मिलते रहे हैं, लेकिन गढ़खल क्षेत्र में मिले इन जीवाश्मों से कई अन्य खुलासे होने की बात कही जा रही है। जानकारी के अनुसार डा. रितेश आर्य ने अपने गृह क्षेत्र कसौली पहुंचकर विश्व पर्यावरण दिवस पर गढ़खल क्षेत्र का दौरा किया तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उन्हें इस क्षेत्र में करीब दो करोड़ वर्ष पुराने फूल व पत्तों के जीवाश्म मिले हैं। ‘दिव्य हिमाचल’ से विशेष बातचीत के दौरान डा. रितेश आर्य ने बताया कि वे पांच जून को विश्व पर्यावरण दिवस पर अपने गृह क्षेत्र कसौली पहुंचे थे। उनका मकसद था कि वे अपनी 30 वर्ष पुरानी यादों को संजो सकें। उन्होंने बताया कि करीब 30 वर्ष पूर्व जब वे पंजाब यूनिवर्सिटी चंडीगढ़ में बीएससी ऑनर्स कर रहे थे तो वर्ष 1864 में अंग्रेज जलभू-वैज्ञानिक मेडीलिकॉट द्वारा कसौली में ढूंढे गए जीवाश्मों के प्रति उनका रुझान बढ़ा था। वहीं, डा. रितेश आर्य ने वर्ष 1989 में कसौली में रिसर्च शुरू की और उन्हें काफी संख्या में जीवाश्म भी मिले थे। डा. आर्य ने बताया कि उन्हीं यादों को ताजा करने के लिए वे कसौली पहुंचे थे और उन्हें इस दौरान गढ़खल में 2 करोड़ वर्ष पुराने जीवाश्म मिले हैं। डा. आर्य ने कहा कि हमारा पर्यावरण संरक्षण का ध्येय तभी पूरा होगा जब हम अपनी इन बहुमूल्य संपदा को भी संरक्षित करेंगे। इसके लिए प्रदेश सरकार को सोचना चाहिए और आगे आकर इस ओर गंभीरता से कार्य करना चाहिए। 

स्ट्रेटीग्राफिक कोरिलेशन तय करता है पैरामीटर

जीवाश्म कितने वर्ष पुराने हैं इसके लिए पैरामीटर स्ट्रेटीग्राफिक कोरिलेशन द्वारा तय किए जाते हैं। स्ट्रेटीग्राफी जियोलॉजी विज्ञान की एक ब्रांच है जिसमें रॉक्स (चट्टानों) के स्तरों की फॉर्मेशन, कंपोजिशन, स्क्विंस व कोरिलेशन का अध्ययन किया जाता है। इसमें स्ट्रेटीग्राफिक कोरिलेशन के माध्यम से बने ग्राफ के द्वारा वैज्ञानिक पता लगाते हैं कि जीवाश्म कितने पुराना है।

कसौली-धर्मपुर में भी मिल चुके हैं जीवाश्म

कसौली व आसपास के क्षेत्रों में जीवाश्म मिलने का सिलसिला ब्रिटिशकाल से जारी है। सन 1864 में अंग्रेज जलभू-वैज्ञानिकों ने कसौली के अपर माल पर कसौली क्लब के पास जीवाश्मों को ढूंढा था। वहीं, जलभू-वैज्ञानिक डा. रितेश आर्य ने वर्ष 1989 में कसौली में जीवाश्मों की विरासत को सहजने के लिए अपनी पीएचडी के दौरान रिसर्च शुरू की और उन्हें काफी संख्या में जीवाश्म भी मिले। कसौली में मिलने वाले करोड़ों वर्ष पुराने जीवाश्म उन पेड़-पौधों के हैं जो अंडमान निकोबार द्वीप सहित मलेशिया व इंडोनेशिया में पाए जाते हैं। 

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