कांग्रेस के अंधेरे में

आत्ममंथन में प्रभावी प्रायश्चित के बजाय हिमाचल कांगे्रस ने खुद को अपने नकाब से बचाने की कोशिश की है। प्रदेश प्रभारी रजनी पाटिल तो उस समय भी इन्हीं राहों पर पार्टी के भीतर टीले और टोली देख रही थीं, लेकिन न तब होश आया और न अब जागने की मंत्रणा सुनी गई। कुल मिलाकर चार लोकसभाई सीटों की हार में खुद को प्रासंगिक बनाते हुए कांगे्रसी नेताओं की जमात वही ढूंढ रही है, जो पिछली बार विधानसभा की हार के मलाल में भी नहीं मिला। कांग्रेस को इस समय स्वयं से मात्र यह पूछना है कि जनता ने उसे क्यों ठुकराया और इसके राष्ट्रीय पैगाम क्या हैं। बेशक मोदी के समर्थन में सियासी प्लाव हुआ, लेकिन कांगे्रस की अपनी तैयारी क्या रही। न उम्मीदवारों का चयन विधानसभा और न ही लोकसभा चुनाव के दृष्टिगत ठीक रहा, तो यह समय सियासत की ठेकेदारी को बंद करने का है। कांगे्रस अगर अपने भीतर कुछ खारिज नहीं कर पाई, तो नई आशाओं के समीकरण शायद ही जोड़ पाएगी। निजी तौर पर सियासी बंटवारे की डगर पर अड़े नेताओं के बीच आपसी फूट का आलम नहीं बदला, तो हार के लिए पार्टी के ठीकरे हर सिर पर सजे रहेंगे। क्या किसी नेता में इतना दम है कि आगे आकर हार की जिम्मेदारी उठा ले। क्या कोई है जो चार सीटों के हारने और हार में अपनी नैतिकता के आधार पर जिम्मेदारी लेने आगे आएगा। क्या वीरभद्र सिंह पार्टी के गणित से अलग अपनी हस्ती के दोष को स्वीकार करेंगे। आनंद शर्मा सरीखे नेताओं को अपना राज्य स्तरीय औचित्य समझ आएगा या पार्टी की कमान थामने वाले अपनी असमर्थता कबूल करेंगे। चुनाव के ठीक पूर्व जिन ताकतों ने सुखविंद्र सिंह सुक्खू से पार्टी की संगठनात्मक शक्ति छीनी या नया निजाम पैदा करने की जल्दबाजी ने हार में जो उपहार पाया, क्या उस पर कांगे्रस चर्चा करना चाहेगी। इसमें दो राय नहीं कि सुक्खू ने पार्टी के भीतर नई मशालें जलाकर अंधेरे दूर करने की कोशिश की, मगर कांगे्रस ने चुनावी अंधेरे फिर चुन लिए। कांगे्रस की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इसके भीतर नेताओं को बड़ा होने की जल्दी है, लेकिन बड़प्पन की तहजीब नहीं। जब यही नेता सरेआम सुक्खू की भुजाएं मरोड़ रहे थे, तो मोहतरमा रजनी पाटिल ने इस अवसाद को क्यों नहीं रोका। क्या हिमाचल की लक्ष्मण रेखा वीरभद्र सिंह बन गए थे या आलाकमान की मजबूरी में कार्यकर्ताओं के लिए कोई ईमानदार पद्धति नहीं बची। लोकसभा चुनाव के दौरान कांगे्रस थी ही कहां और फिर अंजुलि में भरे गए गंगाजल की शपथ पर जो मंडी में चल रहा था, क्या यही आचरण और ताकत बची है। पार्टी में अगर सुखराम के पोते के लिए ही आसन उपलब्ध होना था, तो आम कार्यकर्ता की निष्ठा और प्रतिबद्धता पर कांगे्रस का क्या हक। बेशक पार्टी ने भाजपा से सुरेश चंदेल को छीना, मगर बदले में पाया क्या। हमीरपुर में उम्मीदवार उतारने की देरी के बाद कांगड़ा में राजनीति को भागते चोर की लंगोटी बनाने से कांगे्रस अपनी ही जड़ों की दुश्मन बनी रही। जो नेता कल तक मुख्यमंत्री पद के वारिस बनकर गोटियां फिट कर रहे थे, वे लोकसभा चुनाव की उम्मीदवारी को भी बोझ मानते रहे, तो अब उपचुनाव के कालिया कौन होंगे। क्या कांगे्रस में दम है कि पच्छाद में भाजपा को पछाड़ दे या धर्मशाला की फिर से शरण प्राप्त कर ले। मंथन की बैसाखियों से हार का सफर कितनी दूर तक ले जाएगा, जबकि पार्टी को अपने भीतर से जीत की अभिलाषा जगाने की जरूरत कहीं दिखाई देनी चाहिए। कांग्रेस न तो अब आंतरिक लोकतंत्र की अवतार है और न ही राजनीति का पसंदीदा उत्पाद, बल्कि सभी को अपने भ्रम मिटाकर पार्टी को सतह से उठाकर शृंगार करना होगा। यह कार्य नेताओं की शिनाख्त में नहीं, बल्कि कार्यकर्ताओं में इच्छाशक्ति जगाकर ही पूरा होगा। अपनी हार पर मंथन करते हुए कांगे्रस ने अगर सिर्फ बीती को बसारने का ही प्रयत्न किया, तो कुछ नहीं मिलेगा। अगर पार्टी को आंखें खोलनी हैं, तो हिमाचल के दो उपचुनावों के माध्यम से आगे देखे और इसके लिए संघर्ष के बिना रास्ता नहीं नापा जा सकता।

You might also like