कागजों में सिमट गया गौ संरक्षण

नेरवा—बेसहारा छोड़े गए पशुओं को संरक्षित करने की सरकार चाहे जितनी मर्जी योजनाएं बना ले परंतु सड़कों पर दर-दर भटक रहे हजारों पशु सरकार की योजनाओं को आइना दिखाते नजर आते हैं। उपमंडल चौपाल की सड़कों पर ही इस तरह के सैंकड़ों बेसहारा पशु देखे जा सकते हैं। चंबी, रयूणी, चौपाल, खगना, धबास, झिकनी पुल, नेरवा, बानीपुल, भराणू, फेडिजपुल, गुम्मा, सैंजखड़, मीनस  व कुपवी आदि में इन आवारा पशुओं की काफी तादाद है। नेरवा-झिकनीपुल सड़क पर दस किलोमीटर के दायरे में ही ऐसे दर्जनों पशु हैं जोकि झुंडों में धधकती गर्मी में सड़क किनारे खड़े वाहनों की ओट में आश्रय लिए अकसर देखे जा सकते हैं। यह दिन भर पेट की आग बुझाने के लिए कचरे इतियादी में इधर उधर मुंह मारने के बाद सड़क के किनारे जगह जगह खड़े वाहनों के साये में रात बिताते हैं। बीते समय में कई पशु तो वाहनों की चपेट में आकर घायल भी हो चुके हैं एवं कई पशु आवारा कुत्तों का शिकार हो चुके हैं। वहीँ चंबी-रयूणी-खिड़की के जंगलों में घूम रहे दर्जनों आवारा पशु हर साल खूंखार जंगली जानवरों का शिकार हो जाते हैं। ऐसा भी नहीं है कि सरकार का ध्यान इन बेसहारा, बेजुबान पशुओं की तरफ न गया हो और इनके लिए योजनाए न बनी हों, परन्तु अफसोस की बात यह है की यह योजनाएं मात्र कागजों तक ही सिमट कर रह गई हैं। पिछली कांग्रेस सरकार ने इन पशुओं के संरक्षण के लिए हरेक पंचायत में गोसदन बनाने की योजना बनाई थी परन्तु शायद ही किसी पंचायत में गोसदन बना हो। यदि बना भी है तो कम से कम उपमंडल चौपाल में तो शायद ही किसी गोसदन में इन बेसहारा पशुओं को सहारा मिल पाया हो। इतना जरूर है कि उपमंडल के कुछ समाजसेवी युवा इसके लिए अपने स्तर पर प्रयास करने में जुटे हुए हैं। इन युवाओं ने कुछ स्थानों पर बेसहारा पशुओं के लिए शेड बनाए हैं व कुछ युवा दुर्घटनाओं में घायल अथवा कुत्तों का शिकार हुए पशुओं के उपचार में लगे हुए हैं। बात वर्तमान सरकार की की जाए तो इस सरकार ने आते ही बेसहारा पशुओं के संरक्षण के लिए दो बड़े फैसले लिए थे जिसके तहत शराब की बिक्री और सरकार के अधीन मंदिरों से गौ संरक्षण के लिए पैसा एकत्रित करने की योजना बनाई थी। निर्णय के अनुसार शराब की प्रति बोतल बिक्री पर एक रुपया व मंदिरों की कमाई का कुछ अंश भी इसके लिए सरकार के खाते में धन जमा होना था। प्रदेश में लाखों बोतल शराब प्रतिदिन बिकती है एवं मंदिरों में भी लाखों रुपये प्रतिदिन चढ़ावा चढ़ता है। इस हिसाब के सरकार के पास इस योजना के अंतर्गत डेढ़ साल में करोड़ों, अरबों रुपया इकट्ठा हो जाना चाहिए था व गौ संरक्षण के लिए बनी इस योजना पर कम से कम कार्य तो शुरू हो ही जाना चाहिए था। गौ संरक्षण के प्रति सरकारें कितनी गंभीर रही हैं इस बात का अंदाजा सड़कों पर दर दर भटक रहे पशुओं के देख कर सहज ही लगाया जा सकता है। सड़कों पर घूम रहे इन बेसहारा पशुओं के देख कर सवाल उठना लाजिमी है कि इन बेसहारा बेजुबानों के लिए सरकार द्वारा बनाई गई योजनाएं असल में कहीं है भी या यह मात्र कागजों तक ही सीमित हो कर रह गई हैं।  

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