कारगिलः शौर्य गाथा के बीस वर्ष

Jun 13th, 2019 12:05 am

प्रताप सिंह पटियाल

लेखक, बिलासपुर से हैं

हमारी सेना की आक्रामक नीति व अदम्य साहस के आगे कारगिल क्षेत्र में पाक सेना की पांव जमाने की जुर्रत नहीं हुई और न ही अक्तूबर, 1947 की तर्ज पर उसकी कश्मीर को हथियाने की मुराद पूरी हुई। सभी युद्धों में भारतीय सेना द्वारा पराजय का इतिहास ताउम्र पाक का पीछा करता आ रहा है। अतीत की इन हिमाकतों के लिए पाक की पुश्तें अपनी सेना को जमकर कोस रही हैं…

आजादी के बाद भारत व पाकिस्तान के बीच हुए चार बड़े युद्धों में इतिहास साक्षी रहा है कि जब भी पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान ने भारत की अस्मिता तथा भारतीय सेना के जमीर को ललकारा, हमारी सेना ने अपने पराक्रमी तेवरों से मुंहतोड़ जवाब देकर पाक सेना को उसकी औकात दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। कारगिल युद्ध में भी पाक की नामुराद सेना का यही हश्र हुआ। भारतीय सेना के सामने शर्मनाक पराजय का दंश झेलकर उसे विश्व समुदाय के सामने लज्जित होना पड़ा।

मई, 1999 यानी बीस वर्ष पूर्व पाक सेना ने अपना षड्यंत्रकारी चरित्र दिखाकर नियंत्रण रेखा पार करके कश्मीर में कारगिल के चारों उपखंडों के शिखरों पर घुसपैठ की साजिश को अंजाम देकर इन पर कब्जा कर लिया था। भारत व पाक के बीच मौजूद 740 किलोमीटर लंबी नियंत्रण रेखा, जिसकी गिनती दुनिया की सबसे खतरनाक सरहदों में होती है, उसमें  कारगिल क्षेत्र लगभग 168 किलोमीटर तक फैला है। इस क्षेत्र में पाक सेना की बड़े पैमाने पर यह सुनियोजित घुसपैठ थी, जिसमें पाक सेना की ‘नार्दन लाइट इन्फैंट्री’ के नियमित सैनिकों के साथ पाक समर्थित भाड़े के आतंकी भी शामिल थे और इस बात का खुलासा खुद पाक सेना के पूर्व सैन्य अधिकारी रहे ले.ज. शाहिद अजीज अपनी चर्चित किताब ‘यह खामोशी कब तक’ में पूरी तफसील से बयान कर चुके हैं। कारगिल में घुसपैठ की भनक लगने के बाद पांच मई, 1999 को इस क्षेत्र में दुश्मन की पोजीशन का पता लगाने वाली भारतीय सेना के गश्ती दल का नेतृत्व कर रहे 23 वर्षीय कैप्टन सौरभ कालिया को अपने पांच जवानों सहित 22 दिनों तक पाक सेना की अमानवीय यातनाओं का शिकार होकर शहादत देनी पड़ी थी, जो कि जनेवा कनवेंशन 1949 का सरासर उल्लंघन था। कारगिल युद्ध शुरू होने से पहले ये हिमाचल के हिस्से पहली शहादत थी, जिसके घाव अभी तक जिंदा हैं।

पाक सेना की इस कायराना हरकत के बाद भारतीय सेना के प्रतिशोध की कोई सीमा नहीं रही। पाक सेना ने धोखे से कारगिल में घुसपैठ का दुस्साहस तो कर लिया, लेकिन भारतीय सेना के जांबाजों ने कारगिल को पाक से मुक्त करने के लिए ‘आपरेशन विजय’ चलाकर इतना जोरदार पलटवार किया, जिसका पाक सैन्य रणनीतिकारों को सही अंदाजा नहीं था। कारगिल में भारतीय सैन्य संघर्ष के बरपते कहर के खौफ से पाक हुक्मरानों को अपने बचाव व बिना शर्त युद्ध विराम तथा अमन की पैरोकारी के लिए अमरीका की शरण लेनी पड़ी। 14 मई, 1999 से 26 जुलाई, 1999 तक चले इस युद्ध में भारतीय सेना के 527 रणबांकुरों ने मातृभूमि की रक्षा के लिए शहादत का जाम पिया तथा 1363 सैनिक घायल हुए थे। तिरंगे में लिपट कर लौटे देश के इन 527 शहीदों में 52 सपूतों का संबंध हिमाचल से था, जिन्होंने कारगिल के पहाड़ों को अपने रक्त से सींचकर वीरगति को गले लगाकर भारत की विजय का पताका फहराने में निर्णायक भूमिका अदा की थी। राज्य के इन शहीदों में एक नाम हवलदार उधम सिंह पटियाल (18 ग्रनेडियर) का भी है। इस जांबाज ने 13 जून, 1999 की रात को द्रास सेक्टर में 16 हजार फीट की ऊंचाई पर ‘हंप’ नाम के शिखर पर कब्जा जमाए बैठे दुश्मन से मुक्त कराने में अहम रोल अदा  किया था। इस शिखर पर आक्रामक सैन्य अभियान के दौरान अपने जवानों का नेतृत्व कर रहे उधम सिंह का सीना दुश्मन की भारी तादाद में हो रही फायरिंग में छलनी हो चुका था, लेकिन तिरंगे के समक्ष व साए में भारती सेना के हर सिपाही की शपथ, प्रतिबद्धता तथा राष्ट्र के प्रति समर्पण का जज्बा हमेशा दुश्मन पर भारी पड़ता है। इस जांबाज ने रक्तरंजित होकर दुश्मन के कड़े प्रतिकार तथा गोलीबारी के बावजूद अपने बुलंद इरादों से दुश्मनों का सफाया करके उस मिशन को सफलतापूर्वक पूरा किया और शिखर को अपनी शहादत देकर आजाद कराया था। इस शिखर पर भारतीय सेना का कब्जा होने के बाद इस क्षेत्र में सामरिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण प्वाइंट 5140 तथा अन्य शिखरों पर कब्जा करने के लिए सेना को एक लांच पैड हासिल हुआ था। वीरगति को प्राप्त होने से पहले इस योद्धा ने पाक सेना पर अपने पराक्रम से शौर्य गाथा लिखकर भारत की विजय सुनिश्चित करने में निर्णायक भूमिका निभाई थी।

इस उच्चकोटि के कुशल युद्ध नेतृत्व क्षमता के प्रदर्शन तथा निर्भीकता से मातृभूमि की रक्षा में जीवन का सर्वस्व बलिदान देकर शौर्य पराक्रम की उच्च परंपरा के निर्वाह के लिए भारत सरकार ने इन्हें ‘वीर चक्र’ (मरणोपरांत) से अलंकृत किया था। कारगिल युद्ध में बिलासपुर के शहीद हुए सात शूरवीरों में यह जिला के पहले शहीद थे, इनकी शहादत 14 जून, 1999 को हुई थी। इस युद्ध में अद्भुत वीरता के प्रदर्शन के लिए भारत सरकार ने चार सैनिकों को सर्वाेच्च वीरता पुरस्कार ‘परमवीर चक्र’ से नवाजा था, जिसमें दो परमवीरों का संबंध भी देवभूमि से रहा है। इसके अलावा चार वीरचक्र तथा पांच सेना मेडल भी राज्य के सैनिकों ने अपने नाम करके वीरभूमि को गौरवान्वित किया था। अंततः 26 जुलाई, 1999 को भारतीय सेना ने कारगिल की आखिरी चोटी पर तिरंगा फहराकर ‘आपरेशन विजय’ को आधिकारिक रूप से सफल घोषित कर दिया। हमारी सेना की आक्रामक नीति व अदम्य साहस के आगे कारगिल क्षेत्र में पाक सेना की पांव जमाने की जुर्रत नहीं हुई और न ही अक्तूबर, 1947 की तर्ज पर उसकी कश्मीर को हथियाने की मुराद पूरी हुई। सभी युद्धों में भारतीय सेना द्वारा पराजय का इतिहास ताउम्र पाक का पीछा करता आ रहा है। अतीत की इन हिमाकतों के लिए पाक की पुश्तें अपनी सेना को जमकर कोस रही हैं। इसलिए इस मुल्क ने छद्म युद्ध का सहारा लेना शुरू कर दिया। बहरहाल इस युद्ध में उच्च दर्जे के अनुशासन व कड़े प्रशिक्षण से हासिल की गई सफलता के बाद दुनिया में भारतीय सेना का रुतबा और ऊंचा हुआ। इसलिए देश के हुक्मरानों से आग्रह है कि अपने शौर्य से इतिहास लिखने वाले कई शहीदों के नाम की घोषणाएं, जो आज भी अधूरी हैं, उनकी तरफ तवज्जो दें। वतन की रक्षा के लिए निडरता से अपना सर्वस्व कुर्बान करने वाले शूरवीरों को पूरा देश शत्-शत् नमन करता है। देश सदैव उनके पराक्रम का ऋणी रहेगा।

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