कितनी शहादतें!

मेजर केतन शर्मा पंचतत्त्व में विलीन हो चुके हैं। वतन की हिफाजत में एक और सैनिक ‘शहीद’ हुआ। कश्मीर के अनंतनाग में सोमवार को जो आतंकी हमला किया गया था, मेजर शर्मा ने उसी से जूझते हुए वीरगति प्राप्त की। बीते एक सप्ताह के दौरान 10 जवानों ने ‘शहादत’ दी है। यह सिलसिला जारी है। मंगलवार को भी आतंकियों ने पुलवामा के पुलिस थाने पर ग्रेनेड फेंक कर हमला किया और नौ नागरिकों को जख्मी कर दिया। उनमें दो की हालत गंभीर बताई गई है। वे जिंदा रहें या न रहें, लेकिन छाया-युद्ध का सिलसिला जारी रहेगा। बेशक बीती 18 जून तक ‘आपरेशन ऑलआउट’ में 121 आतंकी मारे जा चुके हैं, लेकिन हमारे जवान भी ‘शहीद’ हो रहे हैं और आम आदमी भी प्रभावित है। क्या इन सिलसिलों का कोई अंत है? क्या उसे पाकिस्तान और उसके आतंकी ही तय करेंगे? क्या हमारे औसत सैनिक की नियति यही है कि उसे मरने के लिए ही सेना में शामिल होना है? हमने पाकिस्तान की सरहद लांघ कर सर्जिकल स्ट्राइक की, लेकिन आतंकवाद जिंदा रहा। हमने पुलवामा में 44 जवानों की ‘शहादत’ के बाद पाकिस्तान में ही घुसकर उसके बालाकोट में हवाई हमला किया, लेकिन कुछ दिन की चुप्पी के बाद फिर आतंकी हमलों की बौछार शुरू हो गई। अब मेजर केतन शर्मा की शहादत के बाद एक और स्ट्राइक की पुरजोर मांग सुनाई दे रही है। यदि एक बार फिर स्ट्राइक करने के बाद आतंकवाद जारी रहा, तो कमोबेश नई रणनीति पर सोचना तो बनता है। एक औसत सैनिक शहीद होता है, तो एक घर-परिवार का ‘चिराग’ बुझ जाता है। एक मां का ‘शेर’ कफन ओढ़े घर लौटता है। एक पत्नी असहाय और विधवा हो जाती है। सबसे घनेरी पीड़ा तो उन बच्चों की है, जो मौत के मायने ही नहीं जानते। एक सैनिक की शहादत एक व्यक्ति, ईकाई, नागरिक या परिजन की मौत नहीं है, बल्कि एक देश को बार-बार मरना पड़ता है, लेकिन हर शहादत के बाद एक ही दिलासा मिलती है कि यह शहादत बेकार नहीं जाएगी…आतंकियों ने बहुत बड़ी गलती की है…उन्हें बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी। फिर कोई आपरेशन किया जाएगा, कुछ दिन भी नहीं बीतेंगे और शहादत के ताबूत सैनिकों के घर लौटते दिखाई देंगे। यह कैसी त्रासद विडंबना है कि हम निरंतर प्रयासों के बावजूद आतंकवाद और छाया-युद्ध को रोक नहीं पा रहे हैं। बेशक हमने पुलवामा हमले के साजिशकार, जैश-ए-मुहम्मद के कमांडर सज्जाद बट्ट को ढेर कर दिया। उसके अलावा, आईईडी विस्फोट के आतंकी तौसीफ को भी मार दिया। बेशक 1990 की तुलना में आतंकवाद कश्मीर में बहुत कम हुआ है, लेकिन उसका खात्मा करने पर सवाल या असमंजस क्यों है? इस संदर्भ में सवाल किया जा सकता है कि अब भी कश्मीर में जमात-ए-इस्लामी का वजूद क्यों है? बेशक उस पर ऐलानिया पाबंदी है। लश्कर-ए-तैयबा और जैश सरीखे आतंकी संगठन बुनियादी तौर पर जमात-ए-इस्लामी की कोख से पैदा हुए हैं। उसके बड़े-बड़े संस्थान आज भी कश्मीर में जिंदा हैं। वहां कश्मीरी नौजवानों का दिमाग ‘जेहादी’ बनाया जाता है, लिहाजा बाद में वे आतंकी बन जाते हैं। उन संस्थानों को कश्मीर से बाहर या देश के बाहर कहीं और खदेड़ने में दिक्कत क्या है? बेशक राज्यपाल शासन के दौरान करीब 250 आतंकियों को कैद किया गया, लेकिन उसका फायदा क्या है? कबाब और बिरयानी मुफ्त में खिलाओ। उन्हें गोली क्यों नहीं मार दी जाती? कई देशद्रोही किस्म के लोगों को सरकार आज भी पेंशन दे रही है। आज भी पाकपरस्त अलगाववादी कश्मीर में हैं। आज भी ऐसे ‘जयचंद’ कश्मीर में हैं, जो आतंकियों को पनाह देते रहे हैं। आपरेशन के दौरान मकानों को जलाना और उन्हें धुआं-धुआं करना इसका पुख्ता सबूत हैं। उनके खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की गई है? आतंकवाद का खात्मा प्रधानमंत्री मोदी की प्राथमिकता सूची की सुर्खियों में है। स्ट्राइक का हौसला भी उन्हीं का था। अब एक और निर्णायक कार्रवाई उन्हें ही करनी पड़ेगी। वह सोचें और रणनीति तय करें, उसके बिना कश्मीर का आतंकवाद समाप्त होने वाला नहीं है।

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