किसी अजूबे से कम नहीं हैं महाभारत के पात्र

महाभारत युद्ध खत्म होने पर इन्होंने गंगा किनारे इच्छा मृत्यु ली। शांतनु से सत्यवती का विवाह भीष्म की ही विकट प्रतिज्ञा के कारण संभव हो सका था। भीष्म ने आजीवन ब्रह्मचारी रहने और गद्दी न लेने का वचन दिया और सत्यवती के दोनों पुत्रों को राज्य देकर उनकी बराबर रक्षा करते रहे। दोनों के निःसंतान रहने पर उनकी विधवाओं की रक्षा भीष्म ने की, परशुराम से युद्ध किया, उग्रायुद्ध का वध किया। फिर सत्यवती के पूर्वपुत्र कृष्ण द्वैपायन द्वारा उन दोनों की पत्नियों से पांडु एवं धृतराष्ट्र का जन्म कराया। इनके बचपन में भीष्म ने हस्तिनापुर का राज्य संभाला और आगे चलकर कौरवों तथा पांडवों की शिक्षा का प्रबंध किया…

-गतांक से आगे…

महाभारत युद्ध खत्म होने पर इन्होंने गंगा किनारे इच्छा मृत्यु ली। शांतनु से सत्यवती का विवाह भीष्म की ही विकट प्रतिज्ञा के कारण संभव हो सका था। भीष्म ने आजीवन ब्रह्मचारी रहने और गद्दी न लेने का वचन दिया और सत्यवती के दोनों पुत्रों को राज्य देकर उनकी बराबर रक्षा करते रहे। दोनों के निःसंतान रहने पर उनकी विधवाओं की रक्षा भीष्म ने की, परशुराम से युद्ध किया, उग्रायुद्ध का वध किया। फिर सत्यवती के पूर्वपुत्र कृष्ण द्वैपायन द्वारा उन दोनों की पत्नियों से पांडु एवं धृतराष्ट्र का जन्म कराया। इनके बचपन में भीष्म ने हस्तिनापुर का राज्य संभाला और आगे चलकर कौरवों तथा पांडवों की शिक्षा का प्रबंध किया। महाभारत छिड़ने पर उन्होंने दोनों दलों को बहुत समझाया और अंत में कौरवों के सेनापति बने। युद्ध के अनेक नियम बनाने के अतिरिक्त इन्होंने अर्जुन से न लड़ने की भी शर्त रखी थी, पर महाभारत के दसवें दिन इन्हें अर्जुन पर बाण चलाना पड़ा। शिखंडी को सामने कर अर्जुन ने बाणों से इनका शरीर छेद डाला। बाणों की शय्या पर 58 दिन तक पड़े-पड़े इन्होंने अनेक उपदेश दिए। अपनी तपस्या और त्याग के ही कारण ये अब तक भीष्म पितामह कहलाते हैं। इन्हें ही सबसे पहले तर्पण तथा जलदान दिया जाता है।

युधिष्ठिर

प्राचीन भारत के महाकाव्य महाभारत के अनुसार युधिष्ठिर पांच पांडवों में सबसे बड़े भाई थे। वह पांडु और कुंती के पहले पुत्र थे। युधिष्ठिर को धर्मराज (यमराज-पुत्र) भी कहा जाता है। वह भाला चलाने में निपुण थे और कभी झूठ नहीं बोलते थे। महाभारत के अंतिम दिन उन्होंने अपने मामा शल्य का वध किया जो कौरवों की तरफ  था।

भीम

हिंदू धर्म के महाकाव्य महाभारत के अनुसार भीम पांडवों में दूसरे स्थान पर थे। वे पवनदेव के वरदान स्वरूप कुंती से उत्पन्न हुए थे, लेकिन अन्य पांडवों के विपरीत भीम की प्रशंसा पांडु द्वारा की गई थी। सभी पांडवों में वे सर्वाधिक बलशाली और श्रेष्ठ कद-काठी के थे एवं युधिष्ठिर के सबसे प्रिय सहोदर थे। उनके पौराणिक बल का गुणगान पूरे काव्य में किया गया है। जैसे-सभी गदाधारियों में भीम के समान कोई नहीं है और ऐसा भी कोई नहीं जो गज की सवारी करने में इतना योग्य हो और बल में तो वे दस हजार हाथियों के समान हैं। युद्ध कला में पारंगत और सक्रिय, जिन्हें यदि क्रोध दिलाया जाए जो कई धृतराष्ट्रों को वे समाप्त कर सकते हैं। सदैव रोषरत और बलवान, युद्ध में तो स्वयं इंद्र भी उन्हें परास्त नहीं कर सकते। वनवास काल में इन्होंने अनेक राक्षसों का वध किया जिसमें बकासुर एवं हिडिंब आदि प्रमुख हैं एवं अज्ञातवास में विराट नरेश के साले कीचक का वध करके द्रौपदी की रक्षा की। यह गदा युद्ध में बहुत ही प्रवीण थे एवं द्रोणाचार्य और बलराम के शिष्य थे। युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में राजाओं की कमी होने पर उन्होंने मगध के शासक जरासंध को परास्त करके 86 राजाओं को मुक्त कराया। द्रौपदी के चीरहरण का बदला लेने के लिए उन्होंने दुःशासन की छाती फाड़ कर उसका रक्तपान किया। भीम काम्यक वन नामक राक्षसी वन का राजा था। महा दैत्य वन का पूर्व राजा हिडिंबसुर राक्षस था। महाभारत के युद्ध में भीम ने ही सारे कौरव भाइयों का वध किया था। इन्हीं के द्वारा दुर्योधन के वध के साथ ही महाभारत के युद्ध का अंत हो गया।  

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