कीटनाशक ही बीमारियों की असली जड़, बच कर रहें

पालमपुर—फसलों में जीवामृत का प्रयोग करने से फसल के पौधों की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।  यह जानकारी पदमश्री सुभाष पालेकर ने कृषि विभाग द्वारा पालमपुर में आत्मा परियोजना के सौजन्य से सुभाष पालेकर प्राकृतिक खेती पर आयोजित प्रशिक्षण कार्यक्रम के दौरान दी। उन्होंने बताया कि फसलों में कीट व बीमारियां खादों व कीटनाशकों के उपयोग की वजह से आती है।  इस बात को विस्तार पूर्वक समझाने के लिए उन्होने फसलों के पौधों की तुलना जंगल के पौधों से की । उन्होंने बताया कि जंगल के पेड़-पौधों में बीमारियां नहीं आती हैं, क्योंकि वहां पर खाद व कीटनाशकों का प्रयोग  नहीं होता है। जंगल के पौधे, पोषक तत्त्व प्रकृति से लेते हैं, इसलिए उनमें बीमारियों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता अधिक होती है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि हम फसलों की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए सुभाष पालेकर प्राकृतिक विधि से खेती करनी पड़ेगी।  पौधों की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए किसानों को यह विधि पूर्ण रूप से अपनाने होगी। अगर कोई किसान पालिकर कृषि का अमल करते हुए कुछ गलतियां करता है और 100 प्रतिशत अमल नहीं कर पाता है तो स्थानांतरण काल के पहले वर्ष में फसलों एवं पेड़ पौधों में 100ः प्रतिरोधक शक्ति का निर्माण नहीं हो पाता है । इसलिए पहले वर्ष में बीमारियों व कीटों के आने की संभावना रहती है ।   इसके साथ ही उन्होंने कीट नियंत्रण के लिए दस्परणी अर्क बनाने की विधि बताई।फसलों की विभिन्न बीमारियों के नियंत्रण के लिए चार विभिन्न दवाइयां बनाने की विधियां बताई। उन्होंने कहा कि सारे रोगों व बीमारियों के नियंत्रण के लिए एक महत्त्वपूर्ण दवाई भी उपलब्ध है, जिसे  40 लीटर पानी, चार लीटर जीवामृत तथा 400 मि.ली. खट्टी छाछ के मिश्रण से बनाया जा सकता है। इस मिश्रण के छिड़काव से पौधों की सारी बीमारियों को नियंत्रित किया जा सकता है।

दस्परणी अर्क बनाने की विधि बताई

इसके साथ ही उन्होंने कीट नियंत्रण के लिए दस्परणी अर्क बनाने की विधि बताई।फसलों की विभिन्न बीमारियों के नियंत्रण के लिए चार विभिन्न दवाइयां बनाने की विधियां बताई। उन्होंने कहा कि सारे रोगों व बीमारियों के नियंत्रण के लिए एक महत्त्वपूर्ण दवाई भी उपलब्ध है, जिसे  40 लीटर पानी, चार लीटर जीवामृत तथा 400 मिलीलीटर खट्टी छाछ के मिश्रण से बनाया जा सकता है।

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