कुंडलिनी शक्ति को जगाने के कई उपाय

सुषुम्ना कमलनाल जैसी है। उसकी भीतरी नाड़ी को ‘वज्रा’ कहा जाता है। इसके भीतर चित्रिणी नाड़ी है जिससे कुंडलिनी शक्ति संचारित होती है। इसी चित्रिणी में षट्चक्र हैं। जब कुंडलिनी शक्ति ऊर्ध्वगामी होती है तो ये चक्र खुलने लगते हैं। योग में इसे ही ‘चक्रवेध’ कहा गया है। कुंडलिनी शक्ति को जाग्रत करने के लिए भारतीय ऋषियों ने कई उपाय बताए हैं : यथा हठयोग, राजयोग, मंत्रयोग, भक्तियोग, कर्मयोग, ज्ञानयोग, लययोग और सिद्धियोग आदि। कुंडलिनी के न जागने (जाग्रत न होने) और प्रकृति तथा पुरुष अथवा शक्ति एवं शिव का संयोग न होने तक जन्म और मृत्यु का चक्र चलता रहता है…

-गतांक से आगे…

अर्थात सुषुम्ना कमलनाल जैसी है। उसकी भीतरी नाड़ी को ‘वज्रा’ कहा जाता है। इसके भीतर चित्रिणी नाड़ी है जिससे कुंडलिनी शक्ति संचारित होती है। इसी चित्रिणी में षट्चक्र हैं। जब कुंडलिनी शक्ति ऊर्ध्वगामी होती है तो ये चक्र खुलने लगते हैं। योग में इसे ही ‘चक्रवेध’ कहा गया है। कुंडलिनी शक्ति को जाग्रत करने के लिए भारतीय ऋषियों ने कई उपाय बताए हैं ः यथा हठयोग, राजयोग, मंत्रयोग, भक्तियोग, कर्मयोग, ज्ञानयोग, लययोग और सिद्धियोग आदि। कुंडलिनी के न जागने (जाग्रत न होने) और प्रकृति तथा पुरुष अथवा शक्ति एवं शिव का संयोग न होने तक जन्म और मृत्यु का चक्र चलता रहता है। जब यह योग हो जाता है तो अमरत्व या मोक्ष की प्राप्ति होती है। पुराणों में एक कथा इस प्रकार है – एक बार भगवान शिव के गले में मुंडों की माला देखकर भगवती पार्वती ने उनसे पूछा, ‘हे प्रभु, ये मुंड किसके हैं और आप इन्हें क्यों धारण किए हुए हैं?’ इस पर शिव ने उत्तर दिया, ‘पार्वती, तुम कई बार जन्मी और मृत्यु को प्राप्त हुई हो। ये मुंड तुम्हारे ही हैं जो ये सूचित करते हैं कि तुम्हारे कितने जन्म हुए हैं।’ यह सुनकर पार्वती जी ने अमरत्व की इच्छा प्रकट की और भगवान शिव ने उन्हें मंत्र दिया। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से यही कहा है, ‘हे अर्जुन, तुम्हारे अनेक जन्म हुए। यद्यपि तुम मेरे अंश हो तथापि तुम इस ज्ञान को भूल गए हो। तुम्हें यह याद नहीं है। अब मैं तुम्हें यह ज्ञान देता हूं।’ शिव और शक्ति का मिलन तथा उनका कभी वियोग न होना ही अमरत्व है। वेदों ने इसे स्वीकार करते हुए कहा है, ‘उसे जानकर ही मृत्यु को पार किया जा सकता है। इसका कोई अन्य उपाय नहीं है।’

चतुर्विद्या सा संदिष्टा क्रियावत्यादि भेदतः।

क्रियावती वर्णमयी कलात्मा वेधमय्यपि।।

अर्थात क्रिया-भेद से कुंडलिनी चार प्रकार से प्रकट होती है ः क्रियावती, वर्णमयी, कलात्मा और वेधमयी। जाग्रत कुंडलिनी शक्ति के बारे में कहा गया है ः सूक्ष्मां सूक्ष्मतरां शक्तिं भित्वा षट्चक्रमांजसा। गच्छंति मध्यमार्गेण दिव्यां पर शिवावधिम। अर्थात कुंडलिनी शक्ति सुषुम्ना मार्ग से षट्चक्रों को वेधती हुई शिव से जा मिलती है। शंकराचार्य ने आनंद लहरी में इसका वर्णन यों किया है-महीं मूलाधारे कपमि मणिपूरे हुतवहम् स्थितं स्वाधिष्ठाने हृदिमरुतमाकाशमुपरि मनोअपिभ्रूमध्ये सकलमपि भित्वाकुलपथम सहस्रारे पद्मे सह रहसि पत्या विहरसि।

 

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